Thursday, 15 August 2019

बचपन बचाओ सेवा समिति ने मनाया स्वतंत्रता दिवस

आज *बचपन बचाओ सेवा समिति* द्वारा  सेक्टर 71 के बारात घर में 73वां स्वतंत्रता दिवस मनाया गया |
73 वां स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए  बचपन बचाओ सेवा समिति ने  समाज को बाल श्रम के कलंक से  मुक्ति दिलाने का देशवासियों से आव्हान किया है |
इस अवसर पर बचपन बचाओ सेवा समिति के पदाधिकारियों ने उपस्थित *सैकड़ों बच्चों को स्कूल बैग वितरित किए*
इस दौरान बच्चों ने भी स्कूल जाने का वादा संस्था के लोगों से किया |
कार्यक्रम की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष *कैलाश सहा जी* ने की , स्वागत संबोधन महासचिव गौरव यादव ने किया |
मंच का संचालन पत्रकार एवं लेखक अजय शर्मा जी ने किया |
   कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलित कर किया गया |
कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों में सपा के जिला अध्यक्ष श्री वीर सिंह यादव जी , *सपा नेता व जन  सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि यादव जी* , कानूनी अधिकार संगठन के फाउंडर एडवोकेट रणपाल अवाना जी,समाजसेवी सुनील शर्मा जी व पुष्पा शर्मा जी ने बाल श्रम पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए |
इस अवसर पर समाजसेवी विक्रम सेठी,आदित्य सिंह, सुरेश सिंह ,अमित सिंह ,सुभाष चंद्र वर्मा ,हनुमान प्रसाद तथा विनोद सहा आदि लोग उपस्थित रहे |

Saturday, 3 August 2019

एफ आई आर दर्ज करने के बाद पुलिस क्या करती है


एफ आई आर किसी घटना के संबंध में पुलिस के पास कार्यवाई के लिए दर्ज की गई सूचना को प्राथमिकी या प्रथम सूचना रिपोर्ट कहा जाता है। प्रथम सूचना रिपोर्ट या एफआईआर एक लिखित प्रपत्र है .

यह सूचना प्रायः अपराध के शिकार व्यक्ति द्वारा पुलिस के पास एक शिकायत के रूप में दर्ज की जाती है। किसी अपराध के बारे में पुलिस को कोई भी व्यक्ति मौखिक या लिखित रूप में सूचित कर सकता है। FIR पुलिस द्वारा तैयार किया हुआ एक दस्तावेज है जिसमे अपराध की सुचना वर्णित होती है I सामान्यत: पुलिस द्वारा अपराध संबंधी अनुसंधान प्रारंभ करने से पूर्व यह पहला कदम अनिवार्य है I

भारत में किसी भी व्यक्ति द्वारा शिकायत के रूप में प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार है। किंतु कई बार सामान्य लोगों द्वारा दी गई सूचना को पुलिस प्राथमिकी के रूप में दर्ज नहीं करती है। ऐसे में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए कई व्यक्तियों को  न्यायालय का भी सहारा लेना पड़ा है।

एक बार एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस मामले की जांच शुरू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होती है। जांच में साक्ष्य एकत्र करना, गवाहों से पूछताछ करना, अपराध स्थल का निरीक्षण करना, फोरेंसिक परीक्षण, बयान दर्ज करना आदि शामिल हैं।

अगर पुलिस अपराधियों की पहचान करने और उन्हें खोजने में सफल होती है तो गिरफ्तारी की जा सकती है।

जांच पूरी होने के बाद, पुलिस अपने सभी निष्कर्षों को एक 'चालान' या आरोप पत्र में दर्ज करेगी। यदि यह माना जाता है कि चार्जशीट पर पर्याप्त सबूत है तो मामला अदालत में जाता है। दूसरी ओर, उनकी जांच के बाद अगर पुलिस यह निष्कर्ष निकालती है कि पर्याप्त सबूत या सबूत नहीं है कि अपराध किया गया है तो वे अदालत में अपने कारणों को सही ठहराने के बाद मामले को बंद कर सकते हैं। यदि पुलिस मामले को बंद करने का निर्णय लेती है, तो यह उनका कर्तव्य है कि इस निर्णय की प्राथमिकी दर्ज करने वाले को सूचित करें।

 एफ आई आर की प्रावधान क्या है......

  • अगर  संज्ञेय अपराध है तो थानाध्यक्ष को तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करनी चाहिए। एफआईआर की एक प्रति लेना शिकायत करने वाले का अधिकार है।
  • एफआईआर दर्ज करते समय पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं लिख सकता, न ही किसी भाग को हाईलाइट कर सकता है।
  • संज्ञेय अपराध की स्थिति में सूचना दर्ज करने के बाद पुलिस अधिकारी को चाहिए कि वह संबंधित व्यक्ति को उस सूचना को पढ़कर सुनाए और लिखित सूचना पर उसके हस्ताक्षर कराए।
  • एफआईआर की कॉपी पर पुलिस स्टेशन की मोहर व पुलिस अधिकारी के हस्ताक्षर होने चाहिए। इसके साथ ही पुलिस अधिकारी अपने रजिस्टर में यह भी दर्ज करेगा कि सूचना की कॉपी आपको दे दी गई है।
  • अगर किसी ने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है, तो पुलिस को एफआईआर के साथ उसकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है।
  • एफआईआर दर्ज कराने के लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत करने वाले को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या उसने अपराध होते हुए देखा हो।
  • अगर किसी कारण आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाएं, तो घबराएं नहीं। ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ देरी का कारण बताना होगा।
  • कई बार पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले ही मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर देती है , जबकि होना यह चाहिए कि पहले एफआईआर दर्ज हो और फिर जांच-पड़ताल।
  • घटना स्थल पर एफआईआर दर्ज कराने की स्थिति में अगर आप एफआईआर की कॉपी नहीं ले पाते हैं, तो पुलिस आपको एफआईआर की कॉपी डाक से भेजेगी।
  • आपकी एफआईआर पर क्या कार्रवाई हुई, इस बारे में संबंधित पुलिस आपको डाक से सूचित करेगी।
  • अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से मना करता है , तो सूचना देने वाला व्यक्ति उस सूचना को रजिस्टर्ड डाक द्वारा या मिलकर क्षेत्रीय पुलिस उपायुक्त को दे सकता है , जिस पर उपायुक्त उचित कार्रवाई कर सकता है।
  • एएफआईआर न लिखे जाने की हालत में आप अपने एरिया मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा-निर्देश देने के लिए कंप्लेंट पिटिशन दायर कर सकते हैं कि 24 घंटे के अंदर केस दर्ज कर एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई जाए।
  • अगर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता, तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है।
  • अगर सूचना देने वाला व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता सकता कि अपराध किस जगह हुआ तो पुलिस अधिकारी इस जानकारी के लिए प्रशन पूछ सकता है और फिर निर्णय पर पहुंच सकता है। इसके बाद तुरंत एफआईआर दर्ज कर वह उसे संबंधित थाने को भेज देगा। इसकी सूचना उस व्यक्ति को देने के साथ-साथ रोजनामचे में भी दर्ज की जाएगी।
  • अगर शिकायत करने वाले को घटना की जगह नहीं पता है और पूछताछ के बावजूद भी पुलिस उस जगह को तय नहीं कर पाती है तो भी वह तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच-पड़ताल शुरू कर देगा। अगर जांच के दौरान यह तय हो जाता है कि घटना किस थाना क्षेत्र में घटी, तो केस उस थाने को स्थानान्तरित (ट्रान्सफर) हो जाएगा।
  • अगर एफआईआर कराने वाले व्यक्ति की मामले की जांच-पड़ताल के दौरान मौत हो जाती है , तो इस एफआईआर को मृत्युकालिक कथन (Dying Declaration) की तरह न्यायालय में पेश किया जा सकता है।
  • अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है। इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए। इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है।

अब ये ZERO FIR क्या होता हैं:

अक्सर FIR दर्ज करते वक़्त आगे के कार्यवाही को सरल बनाने हेतु इस बात का ध्यान रखा जाता हैं कि घटनास्थल से संलग्न थाने में ही इसकी शिकायत दर्ज हो परन्तु कई बार ऐसे मौके आते हैं जब पीड़ित को विपरीत एवं विषम परिस्थितियों में किसी बाहरी पुलिस थाने में केस दर्ज करने की जरुरत पड़ जाती हैं. मगर अक्सर ऐसा देखा जाता हैं कि पुलिस वाले अपने सीमा से बहार हुई किसी घटना के बारे में उतने गंभीर नहीं दिखाए देते. ज्ञात हो कि FIR आपका अधिकार हैं एवं आपके प्रति हो रही असमानताओ का ब्यौरा भी, अतः सरकार ने ऐसे विषम परिस्थितियों में भी आपके अधिकारों को बचाए रखने हेतु ZERO FIR का प्रावधान बनाया है. इसके तहत पीड़ित व्यक्ति अपराध के सन्दर्भ में अविलम्ब कार्यवाही हेतु किसी भी पुलिस थाने में अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं एवं बाद में केस को उपरोक्त थाने में ट्रान्सफर भी करवाया जा सकता हैं.

कब करे zero FIR का उपयोग:

हत्या, रेप एवं एक्सीडेंट्स जैसे अपराध जगह देखकर नहीं होती या फिर ऐसे केसेस में ये भी हो सकता है कि अपराध किसी उपरोक्त थाने की सीमा में न घटित हो. ऐसे केसेस में तुरंत कार्यवाही की मांग होती है परन्तु बिना FIR के कानून एक कदम भी आगे नहीं चल पाने में बाध्य होती हैं. अतः ऐसे मौको में मात्र कुछ आई-विटनेस एवं सम्बंधित जानकारियों के साथ आप इसकी शिकायत नजदीकी पुलिस स्टेशन में करवा सकते हैं. ध्यान रहे लिखित कंप्लेंट करते वक़्त FIR की कॉपी में हस्ताक्षर कर एक कॉपी अपने पास रखना न भूले.
ये ज्ञात हो की FIR दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया को आगे बढाने की सारी ज़िम्मेदारी पुलिसवालो का प्रधान उद्देश्य होती हैं अतः कोई भी पुलिस वाला सिर्फ ये कहकर आपका FIR लिखने से मना नहीं कर सकता कि “ ये मामला हमारे सीमा से बाहर का है”

कैसे करे zero फिर:

सामान्य FIR के तरह ही zero FIR भी लिखित या मौखिक में करवाई जा सकती हैं. यदि आप चाहे तो पुलिस वाले से रिपोर्ट को पढने का भी अनुरोध कर सकते हैं. ध्यान दे की FIR लिखने के बाद पुलिस अबिलम्ब उस केस के छानबीन में जुट जाये.

याद रखे की विषम परिस्थितयों में आपके द्वारा दिखाई गयी सूझ-बुझ एवं जागरूकता ही आपको विषम परिस्थितयों से उबार सकती हैं. अतः हमारी आप सभी से ये ही गुजारिश हैं की सुरक्षित रहे, जागरूक रहे एवं लोगो को भी जागरूक करते रहे. ज्ञात रहे की आपके द्वारा दिखाई जागरूकता एक विकसित समाज की स्थापना करने में हमारी काफी मदद कर सकती हैं.

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