Saturday, 30 November 2019

महाराष्ट्र में शिवसेना की चुनौतियां

नवंबर 2019 में मुंबई और मई 1996 में दिल्ली के मौसम की तासीर और वक्त का भले ही फासला हो, लेकिन दोनों में कुछ समानताएं जरूर हैं। तब लोकसभा में 162 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बनकर उभरी भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार महज 13 दिन ही चल पाई। सबसे बड़ा दल विपक्ष में बैठने को मजबूर हुआ, और एक-एक सांसद वाले दल भी सरकार में शामिल होने में कामयाब रहे। ठीक उसी तरह मुंबई में महाराष्ट्र विधानसभा की 105 सीटें जीत चुकी सबसे बड़े दल के नेता देवेंद्र फड़नवीस की सरकार महज 80 घंटे तक ही रह सकी। अब देवेंद्र फड़नवीस को अपने शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी की तरह नेता विपक्ष की भूमिका निभानी है।

क्या महाराष्ट्र में इतिहास दोहराया जाने वाला है?


ऐसे में एक सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या महज डेढ़ साल के अंतराल पर हुए चुनावों के बाद जिस तरह केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी अगुआई में भारतीय जनता पार्टी उभरी और उसके बाद साढ़े पांच वर्ष सरकार चलाने में सफल रही, क्या महाराष्ट्र में वैसा ही इतिहास दोहराया जाने वाला है? चूंकि राजनीति की दुनिया गणित की तरह सटीक नहीं होती, लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्य और राजनीतिक हालात बता रहे हैं कि शिवसेना के सामने आत्मसमर्पण ना करके भाजपा ने बड़ा संदेश दिया है। उसने साफ कर दिया है कि वह अपने सहयोगी दलों का साथ तो चाहेगी, लेकिन उनकी उल-जलूल मांगों के सामने नहीं झुकेगी।

महाराष्ट्र के संदेश बिहार, पंजाब और दूसरे राज्यों में उसके सहयोगी दल स्पष्टता से सुन चुके होंगे। इसके बाद उनका आशंकित होना और नए मिजाज के मुताबिक रणनीति बनाना स्वाभाविक है। तो क्या यह मान लिया जाए कि भाजपा अपने गठबंधन में अब दबंग बड़े भाई की भूमिका निभाने को कमर कस चुकी है? महाराष्ट्र के हालात तो कम से कम यही संकेत देते हैं।



जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर नितिन गडकरी आगे आए 

भाजपा और शिवसेना के सूत्रों से कुछ खबरें आई हैं कि भाजपा की करीब तीन दशक पुरानी और सबसे विश्वस्त सहयोगी मानी जाती रही शिवसेना ढाई-ढाई वर्ष के मुख्यमंत्री की अपनी मांग से तब पीछे हटती जा रही थी, जब इस मसले को सुलझाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी आगे आए थे। तब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने आपसी बातचीत में स्वीकार कर लिया था कि अगर भाजपा गडकरी को मुख्यमंत्री बनाती है तो वे ढाई वर्ष के लिए शिवसेना के मुख्यमंत्री की मांग को वापस ले सकते हैं।

सूत्रों के हवाले से आई खबरों के मुताबिक उद्धव ठाकरे इस बात पर भी तैयार थे कि गडकरी की अगुआई में बनने वाली सरकार में आदित्य ठाकरे को उप- मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा तो वे नए हालात को स्वीकार कर लेंगे। लेकिन सूत्रों के हवाले से आई खबरों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिवसेना की इस बदली मांग को ठुकरा दिया। दरअसल प्रधानमंत्री खुद महाराष्ट्र की चुनावी सभाओं में दिल्ली में नरेंद्र और मुंबई में देवेंद्र का नारा दे आए थे। प्रधानमंत्री का मानना था कि अगर गडकरी को मुख्यमंत्री स्वीकार किया गया तो शिवसेना इसे अपनी जीत के तौर पर प्रचारित करेगी और इसके संकेत ठीक नही जाएंगे। इसलिए भाजपा ने महाराष्ट्र की सरकार को कुर्बान करना ज्यादा उचित समझा।



ढाई-ढाई वर्ष के सत्ता का बंटवारा 

ढाई-ढाई वर्ष के सत्ता के बंटवारे की शिवसेना की मांग को अगर भाजपा स्वीकार कर लेती तो यह भारतीय राजनीति में एक और गलत परंपरा बनती। करीब दोगुनी ज्यादा सीटें जीतने वाला दल सत्ता में सहयोगी की भूमिका में रहे और छोटा दल सत्ता की अगुआई करे, यह उस जनता का अपमान होता, जिसने सबसे बड़े दल को चुना है। वैसे भी महाराष्ट्र में जो सरकार बनी है, उसे चाहे जितना भी संविधान की रक्षा के तौर पर प्रचारित किया जाए, यह राज्य की जनता के बड़े हिस्सों के मतों का अपमान ही है, क्योंकि जनता ने चुनाव पूर्व गठबंधन को जीत दी थी।



एक बार फिर वर्ष 1996 की घटनाएं याद आती हैं

भाजपा को बड़ी जीत देने का संकेत यही था कि राज्य की जनता के लिए नई सरकार के संदर्भ में वही उसकी पसंदीदा पार्टी रही। इन संदर्भों में देखें तो शिवसेना की अगुआई में गठित सरकार को राज्य के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा शायद ही स्वीकार करे। यहीं पर एक बार फिर वर्ष 1996 की घटनाएं याद आती हैं। भाजपा को सत्ता से अलग-थलग रखने को देश ने स्वीकार नहीं किया और भारतीय मतदाओं ने अगले चुनाव में और आक्रामक ढंग से उसे समर्थन दिया। अगर दो आम चुनावों से भाजपा केंद्र की सत्ता में अपने दम के बहुमत से काबिज है और जनता का उसे व्यापक समर्थन मिला है तो उसकी एक बड़ी वजह यही है कि राजनीति की दुनिया में सारे दलों का उसे अलग-थलग रखने की रणनीति आम लोगों को पसंद नहीं आई। इसके बाद प्रतिक्रिया स्वरूप भारतीय मतदाता और आक्रामक ढंग से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में गोलबंद हुआ।



जब मायावती मुकर गईं, और गठबंधन टूट गया

छोटे दलों के साथ बड़े दलों की सरकार चलाने का अनुभव भाजपा का भी रहा है और निश्चित तौर पर वह अनुभव खराब ही रहा है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह से अलगाव के बाद 63 विधायकों वाली बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को 176 विधायकों वाली भाजपा ने सहयोग दिया और तब भी तय हुआ था कि आधे-आधे वक्त के लिए दोनों के मुख्यमंत्री होंगे। मायावती ने अपनी मियाद तो पूरी कर ली और बड़े दल वाली भारतीय जनता पार्टी ने उनका धैर्यपूर्वक साथ दिया।

लेकिन जब वायदे के मुताबिक भाजपा के नेता कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाने की बारी आई तो मायावती मुकर गईं, और गठबंधन टूट गया। इसी तरह बीते दिनों कर्नाटक में हुआ था, जब जनता दल सेक्युलर जैसी छोटी पार्टी के नेता एचडी कुमारस्वामी को बड़े दल भाजपा ने समर्थन दिया और जब भाजपा की सरकार बनाने की बारी आई तो कुमारस्वामी की पार्टी मुकर गई। इसके बाद कर्नाटक में चुनाव हुए और भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत मिला। कुछ समीक्षक मानते हैं कि महाराष्ट्र में भी ऐसा ही होने की संभावना ज्यादा है।



सिंचाई घोटाले के आरोपी अजीत पवार राज्य के उप-मुख्यमंत्री!

दरअसल महाराष्ट्र सरकार में शामिल होने वाले मंत्रियों का इतिहास देखें तो बहुत कुछ सामने आता है। दिल्ली के महाराष्ट्र सदन घोटाला में जेल की यात्रा कर चुके छगन भुजबल पहले शिवसेना के नेता रहे और बाद में विद्रोह करके राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। उन्हें शिवसेना का आम कैडर स्वीकार नहीं कर पाता था। एक दौर में उनके खिलाफ शिवसेना ने जगह-जगह आक्रामक प्रदर्शन किए थे। उनकी छवि भी साफ नहीं है। अजीत पवार बेशक अभी सरकार में शामिल नहीं हैं, लेकिन माना जा रहा है कि 70 हजार करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले के आरोपी अजीत पवार राज्य के उप-मुख्यमंत्री हो सकते हैं। इन पुराने और घाघ राजनेताओं पर उद्धव ठाकरे कैसे काबू कर पाएंगे, इसे देखना दिलचस्प होगा।



शिवसेना के समक्र्ष हिंदुत्व की चुनौती

वैसे शिवसेना के सामने एक और बड़ी चुनौती सामने आने वाली है। उसके कैडर का विकास उग्र हिंदुत्व के साथ आक्रामक शैली की स्थानीय राजनीति करते हुआ है। अपने गठन से लेकर अब तक कुछ मौकों को छोड़कर उसका कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कैडरों से आक्रामक विरोध का रिश्ता रहा है। लेकिन बदले हालात में उन्हें साथ बैठने में हिचक होगी। कुछ वैसी ही हालत महाराष्ट्र के शिवसैनिकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच होने जा रही है, जैसी एक-दूसरे के व्यापक प्रतिस्पर्धी रहे उत्तर प्रदेश के समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के कैडरों के बीच रही। कांग्रेस के साथ से अगर शिवसेना को लंबी पारी खेलनी है तो उसे उग्र हिंदुत्व की राह को छोड़ना पड़ेगा या उसे थोड़ा नरम बनाना पड़ेगा। पार्टी तो बन भी सकती है, लेकिन तीन दशक से स्थानीय स्तर पर तेवर की राजनीति की रवायत में प्रशिक्षित उसके कार्यकर्ताओं के लिए ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा।

यही शिवसेना की बड़ी चुनौती होगी। इसी आधार पर सरकार की स्थिरता पर सवाल उठेंगे। वैसे कुछ महीने बाद राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं। अब तक शिवसेना भारतीय जनता पार्टी के साथ चुनाव लड़ती रही है। लेकिन बदले हालात में उसे कई जगह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के लिए त्याग करना पड़ेगा। यह त्याग पार्टी के शीर्ष स्तर पर एक हद तक स्वीकार्य हो भी जाए, लेकिन अपनी विकास की बाट जोह रहे स्थानीय कैडरों को यह शायद ही स्वीकार्य हो। शिवसेना के लिए यह भी चुनौती होगी।



भविष्य में भाजपा को बड़ा फायदा होने की उम्मीद

शरद पवार बेशक इन दिनों बड़े रणनीतिकार माने जा रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि उनकी छवि ऐसे राजनेता की है, जो अवसरवादी है। सोनिया गांधी के विदेशी मूल के सवाल पर उन्होंने तारिक अनवर और पीए संगमा के साथ कांग्रेस से विद्रोह करके अलग पार्टी बनाई। यह बात और है कि 1999 में उसी कांग्रेस के साथ उन्होंने राज्य में और 2004 से लेकर 2014 तक केंद्र में सरकार चलाई। चूंकि वे महाराष्ट्र में इसी रूप में स्थापित हैं और उनका अपना एक वोट बैंक भी है, लिहाजा उनका इस नए गठबंधन में कोई नुकसान नहीं होने जा रहा।

रिमोट कंट्रोल से सरकार वे चलाएंगे और सत्ता की मलाई उनके लोग और उनकी पार्टी चखती रहेगी। कांग्रेस राज्य में इतनी कमजोर हो गई है कि उसके पास खोने को कुछ खास है भी नहीं, इसलिए मौजूदा गठबंधन में उसे सिर्फ पाना ही है। वैसे भी वह सबसे ज्यादा फायदे में है। जिस सोनिया गांधी को बाल ठाकरे स्वीकार तक नहीं कर पाते थे, उनके बेटे और पोते उनके सामने सरकार बनाकर झुक ही गए हैं। कांग्रेस मौजूदा गठबंधन में शिवसेना को उदार हिंदुत्व की तरफ मोड़ने की कोशिश भी करेगी। ऐसा करने के लिए उसने शपथ ग्रहण के दिन संकेत दे भी दिए, जब उसके शीर्ष नेतृत्व ने शपथ ग्रहण से दूरी बनाए रखी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि किसे सबसे ज्यादा नुकसान होना है, जाहिर है कि वह नुकसान शिवसेना को ही उठाने के लिए तैयार रहना होगा। हिंदुत्व के नाम पर बने वोट बैंक को जब निराशा होगी तो वह कांग्रेस या राष्ट्रवादी कांग्रेस की बजाय उदार हिंदुत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की ओर जाएगा।

कांग्रेस पर मुश्किल है भरोसा करना

राजनीति के कई सिद्धांत परंपराओं के आलोक में विकसित होते हैं। भारतीय राजनीति में कई बार ऐसा हुआ है कि बड़े दल ने सत्ता से बाहर रहकर छोटे दल को समर्थन दिया, इसके बावजूद वे सरकारें चल नहीं पाईं। सबसे पहले 1979 में केंद्र में चौधरी चरण सिंह की अल्पमत सरकार को कांग्रेस ने समर्थन दिया और उस सरकार को संसद जाने से पहले ही धराशाई कर दिया। वर्ष 1990 में 54 सांसदों वाले चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी को 195 सांसदों वाली कांग्रेस ने समर्थन दिया। जिस तरह इस बार भी कुछ राजनीतिक समीक्षक कह रहे हैं कि उद्धव ठाकरे सरकार पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करेगी, कुछ वैसा ही 1990 में भी दावा किया गया था। लेकिन चंद्रशेखर की सरकार चार महीने बाद ही कांग्रेस ने गिरा दी थी।

जब गुजराल सरकार को गिराने में कांग्रेस ने तत्परता दिखाई

सरकार बनवाने और गिराने की परंपरा को कांग्रेस ने जारी रखा। पहले 1997 में राजीव गांधी की हत्या की जांच कर रहे जैन आयोग की रिपोर्ट में तत्कालीन जनता दल के सहयोगी डीएमके का नाम आने के आरोप में तत्कालीन एचडी देवगौड़ा सरकार और 1998 में इंद्रकुमार गुजराल सरकार को गिराने में कांग्रेस ने तत्परता दिखाई। चाहे चरण सिंह रहे हों या देवेगौड़ा या इंद्रकुमार गुजराल, ये सभी नेता कभी न कभी कांग्रेस में रहे थे और उनकी विचारधारा कांग्रेसी सोच से ज्यादा इतर नहीं थी। फिर भी खुद के लायक बेहतर मौका ताड़ते ही उन सरकारों को गिराने में कांग्रेस ने गुरेज नहीं किया तो क्या गारंटी है कि ठीक विपरीत विचारधारा वाली पार्टी के नेता उद्धव ठाकरे की सरकार को कांग्रेस बहुत देर तक बर्दाश्त कर पाएगी।

विधायिका की इज्जत खतरे में, कैसे बचेगी

महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत साबित करने को लेकर उठा विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। साबित हुआ कि राज्यपाल की भूमिका निष्पक्ष नहीं थी। इसके पहले भी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं, जब रात के अंधेरे में सरकारें बनीं और बिगड़ीं और अधिकतर मामले न्यायालय तक गए। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का बहुमत सिद्ध करने को लेकर प्रक्रिया तय की है। वैसे तो संसद और विधानसभाएं अपने बनाए नियमों से ही चलती हैं इसमें किसी बाहरी का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। सदन स्वयं मालिक और मुख्तार है। सिद्धांतत: यह विधायिका अदालत से भी ऊपर है। लोकतंत्र में यदि विधायिका सर्वोच्च नहीं रहेगी तो संकट बढ़ेगा। लेकिन सवाल इससे भी बड़ा है। विधायिका के विवादों के लिए कौन जिम्मेवार है?

निष्पक्षता पर सवाल
क्या न्यायपालिका को यह तय करने का अधिकार है कि सदन की कार्यवाही कैसे चलेगी और कैसे नहीं? इसके लिए उन तमाम मिसालों को देखना होगा जो पहले भी थीं और बन भी रही हैं। 1998 में जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर उनकी सरकार के एक मंत्री जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी थी, तब भारतीय जनता पार्टी ही पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट गई। बाद में जगदंबिका पाल हाई कोर्ट के निर्णय को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट गए थे। तब न्यायालय ने तय किया था कि बहुमत किसके पक्ष में है, यह जानने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया के तहत सदन चलेगा। एक तरफ जगदंबिका पाल बैठेंगे और दूसरी तरफ कल्याण सिंह। विधायक अपने वोट डालकर यह तय करेंगे कि विधायकों का बहुमत किसके साथ है। तब भी न्यायालय के निर्णय के खिलाफ बहुत आवाजें उठी थीं। आरोप लगे थे कि कोर्ट को या अधिकार नहीं कि वह सदन को निर्देश दे कि किस प्रक्रिया के तहत कार्यवाही चलेगी। वास्तव में संसद और विधानसभाएं अपने बनाए नियमों से ही चलती हैं। उनमें किसी बाहरी का कोई दखल नहीं होता। सदन की अवमानना करने वाले को वे स्वयं दंडित करती हैं और उन्हें जेल भी भेज सकती हैं। लेकिन इसके बावजूद हाल में न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले ही मान्य हुए और चीजें उन्हीं के अनुसार चलीं।


उत्तर प्रदेश विधानसभा के पहले अध्यक्ष राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने कहा था कि यदि उनकी निष्पक्षता पर एक भी विधायक सवाल उठा देगा तो वह इस्तीफा दे देंगे। वास्तव में विधानसभा अध्यक्षों को इसी गरिमा के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन जिस तरह से तमाम राजभवन सवालों के घेरे में आते गए और फिर विधानसभा अध्यक्षों पर उंगलियां उठीं उसके बाद संपूर्ण विधायिका की ही प्रतिष्ठा कम होती चली गई। आज आलम यह है कि विधानसभा अध्यक्ष पर निष्पक्षता को लेकर गंभीर आरोप लगते हैं। वे वाकई एकतरफा निर्णय करते हैं। अपनी पार्टी की सभा और सम्मेलनों में जाते हैं। जबकि परंपरा यह रही है कि लोकसभा और विधानसभाओं के अध्यक्ष पद के दावेदार पहले ही अपने दल से इस्तीफा देकर दलीय राजनीति से दूर हो जाते थे। लेकिन धीरे-धीरे विधानसभा अध्यक्ष मुख्यमंत्रियों के इशारे पर सदन चलाने लगे।

जून 1995 में जब यूपी में मायावती ने समाजवादी पार्टी से संबंध तोड़कर मुलायम सरकार गिरा दी और स्वयं मुख्यमंत्री बन गईं तब मुलायम सिंह के निष्ठावान तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष धनीराम वर्मा की कार्यशैली पर सवाल उठे थे। किसी भी तरह बेईमानी ना हो पाए इसके लिए राज्यपाल ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर विधानसभा के लिए एक संदेश भेजा था। संदेश था कि जब तक मायावती सरकार का बहुमत परीक्षण न हो जाए तब तक किसी भी कीमत पर सदन स्थगित न किया जाए। सदन की बैठक शुरू हुई तो समाजवादी पार्टी के विधायकों के हंगामे के बीच ही विधानसभा अध्यक्ष सदन स्थगित करके चले गए। जो आशंका थी वही हुआ। बाद में विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी की कार्यशैली पर भी उंगलियां उठीं। आरोप लगे कि दलबदलू विधायकों की सदस्यता को विधानसभा अध्यक्ष लंबे समय तक लटकाए रखते हैं। जो विधायक समर्थन में नहीं होते उनकी सदस्यता तत्काल चली जाती है, जबकि जो विधायक उनके दल से जुड़े होते हैं उनकी याचिका पर सुनवाई बहुत धीरे चलती है। उन्होंने एक ऐसा निर्णय दिया जिसको लेकर काफी चर्चा हुई।


इसी तरह के विवादों के मामले अदालत जाते हैं। जब हम स्वयं अदालत जाते हैं तो फिर यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि न्यायालय कोई निर्णय पारित ना करे? वे निर्णय संविधान के अनुसार ही होते हैं। अदालत सदन की कार्रवाई की प्रक्रिया तय करती है तो उसमें गलत क्या है? वास्तव में इसके लिए वे नेता ही जिम्मेदार हैं जो मनमाने ढंग से निर्णय करते हैं और संवैधानिक मान्यताओं-परंपराओं का पालन नहीं करते। जब भेदभावपूर्ण निर्णय होंगे तो अदालतों को हस्तक्षेप का अवसर मिलेगा ही। राज्यपाल की भूमिका और विधानसभा अध्यक्षों की कार्यशैली पर न्यायालयों के तमाम निर्णय आ चुके हैं लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। ज्यादातर निर्णयों ने विधायिका के अधिकारों को सीमित ही किया है। यदि इससे बचना है तो ऐसे रास्ते निकालने होंगे जिनमें भेदभाव की गुंजाइश ना हो। मुख्यमंत्री वही बने जिसके पास बहुमत हो।

हस्तक्षेप का अवसर
राज्यपाल अपने विवेक के अनुसार बहुमत वाले दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करता है। मनमानी की छूट यह विवेक ही देता है। क्यों न जहां किसी भी दल को बहुमत ना हो वहां पर सदन ही अपना नेता चुन ले। यह प्रक्रिया बहुत निष्पक्ष होगी। विधायिका में बैठे लोग ऐसा आचरण करें कि न्यायालय तक मामला पहुंचे ही नहीं। यदि राजनीतिक दलों और नेताओं ने विधायिका की मर्यादा को नहीं बचाया तो वह दिन दूर नहीं जब सदन से उठने वाली आवाजें नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाएंगी। जरूरी है कि सदन अपने नियमों से चले और उसकी आवाज दूर तक पहुंचे। लेकिन यह तभी संभव होगा जब उसका रवैया निष्पक्ष हो।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

Friday, 29 November 2019

क्या बीजेपी ढलान पर है

भारी उठापटक के बीच करीब एक महीने की कोशिशों के बाद महाराष्ट्र में एनसीपी कांग्रेस और शिवसेना के गठबंधन की सरकार बन गई  मुंबई के शिवाजी पार्क से  शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की शपथ ली . पूरी दुनिया ने  महाराष्ट्र की बदलती हुई राजनीति को देखा  और राजनीति में एक नए प्रयोग को भी देखा. जो यह बता रहा था कि यह बाला साहब ठाकरे द्वारा पोषित नई शिवसेना है उद्धव ठाकरे की.  इस सरकार में उद्धव ठाकरे के मेंटर की भूमिका निभा रहे हैं एनसीपी प्रमुख शरद पवार.  बीजेपी की 30 साल से भी ज्यादा पुरानी सहयोगी शिवसेना के छिटक कर एनसीपी-कांग्रेस के नजदीक चले जाने के बाद भारतीय राजनीति में पहली बार एक नए तरीके के राजनीतिक गठबंधन का जन्म हुआ है। इसकी सफलता अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन पहली बार देश भर में संदेश गया है कि हमेशा विजेता की मुद्रा में रहने वाले मोदी-शाह की जोड़ी पराजित भी हो सकती है। बीजेपी की यह पराजय अपनों के ही हाथों हुई है। शिवसेना उसकी अपनी थी। अपनों को छोड़कर नए की तलाश के तीन-तिकड़म में बीजेपी मात खा गई।

महाराष्ट्र का खेल
महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ है उससे अभी कहीं ज्यादा होना है। शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस का एक साथ आना एक नए किस्म के राजनीतिक गठबंधन की आहट है जिसकी धुरी 90 के दशक वाली धर्मनिरपेक्षता तो कतई नहीं है। उग्र हिंदुत्व वाली शिवसेना थोड़ी सेक्युलर बनने को तैयार है जबकि कांग्रेस और एनसीपी जैसी पार्टियां हिंदू दिखने को आतुर हैं। यह गठबंधन एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सत्ता में बराबर की साझेदारी के अलावा मोदी-शाह के एकतरफा वर्चस्व और अहंकार की मुखालिफत पर टिका है। सारा किस्सा शुरू हुआ 9 नवंबर की शाम से, जिस दिन सुबह सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राममंदिर निर्माण का फैसला सुनाया था। यहां अयोध्या का जिक्र इसलिए क्योंकि आज से करीब 30 साल पहले जब अयोध्या आंदोलन की जोरशोर से शुरुआत हुई थी, तभी मौजूदा शक्ल वाली बीजेपी का अभ्युदय हुआ था और तभी पहली बार बीजेपी-शिवसेना गठबंधन अस्तित्व में आया था जो तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद अब तक जारी रहा।

हिंदुत्व की राजनीति करने वाले इन दोनों दलों के टूट की वजह मूलतः वर्चस्व की लड़ाई ही रही। बालासाहेब ठाकरे के जमाने से ही दोनों पार्टियों के बीच सहमति बनी थी कि केंद्र में बड़े भाई की भूमिका बीजेपी की होगी जबकि महाराष्ट्र में बड़े भाई वाली भूमिका शिवसेना निभाएगी। यह व्यवस्था गठबंधन वाले दौर की थी, जब किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिलता था। 2014 के बाद देश की राजनीति बदली। पिछले दो लोकसभा चुनावों से बीजेपी खुद अपने दम पर स्पष्ट बहुमत में है और उसने ऐलान भी कर दिया है कि अब उसका लक्ष्य सिर्फ 50 फीसदी सीट पाना नहीं बल्कि 50 प्रतिशत मतदाताओं का वोट हासिल करना है। साफ है कि बीजेपी को अब कहीं भी जूनियर पार्टनर वाली भूमिका में रहना कतई स्वीकार नहीं है। अगर बिहार में बीजेपी को जेडीयू से एक भी सीट ज्यादा मिली तो अगले साल ठीक यही स्थिति वहां नीतीश कुमार के साथ भी हो सकती है।

 

महाराष्ट्र के बाद बीजेपी की गठबंधन दृष्टि कुछ ज्यादा ही मजबूत शक के घेरे में आ गई है। जब जरूरत हुई तो सत्ता पाने और अपना दायरा बढ़ाने के लिए सहयोगियों से गठबंधन करने और जरूरत खत्म होते ही उसे तोड़ देने की कला में बीजेपी को महारत हासिल है। उसे जब लगा तो मायावती से गठबंधन कर यूपी में सामाजिक समरसता का गणित ठीक किया। जरूरत पड़ी तो समय-समय पर ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, करुणानिधि और रामविलास पासवान को दोस्त बनाया। एक वक्त आया कि बीजेपी ने फारूक अब्दुल्ला को भी अपने साथ लिया लेकिन जब कश्मीर घाटी में जमीन तलाशने की दरकार हुई तो महबूबा मुफ्ती से हाथ मिलाकर सरकार बनाई और करीब ढाई साल तक चलाई भी।

 

हरियाणा अभी बिलकुल ताजा उदाहरण है जहां बीजेपी बहुमत से महज 5 सीट पीछे रह गई तो उसने तुरंत ओम प्रकाश चौटाला के पोते और अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत चौटाला की जेजेपी से हाथ मिलाने में देरी नहीं की। इस नए गठबंधन का क्या हश्र होगा बाद में पता चलेगा, लेकिन इतिहास बताता है कि बीजेपी को ऐसा गठबंधन तभी तक स्वीकार है जब तक सत्ता में बने रहने के लिए वह जरूरी हो। ऐसा नहीं है कि गठबंधन करने वाले सहयोगी दलों को यह पता नहीं है। लेकिन सत्ता में साझीदार बनने की उनकी अलग तरह की मजबूरी होती है जिसका इस्तेमाल बीजेपी करती रही है। गठबंधन बनाने और फिर उसे तोड़ देने में फायदा हमेशा बीजेपी को हुआ। उसके सहयोगी अपनी जमीन गंवाते गए और बीजेपी का चुनावी ग्राफ चढ़ता गया। कहा जा सकता है कि बीजेपी सहयोगियों के कंधे को सत्ता की सीढ़ी बनाती है और जब उसे लगता है कि गठबंधन के बगैर सत्ता हासिल हो सकती है तो उन्हें दरकिनार कर आगे बढ़ जाती है।

विधानसभा चुनाव की एक रैली में प्रधानमंत्री के साथ देवेंद्र फडणवीस और उद्धव ठाकरे

अभी महाराष्ट्र की ही तरह बीजेपी के लिए एक खतरे की घंटी झारखंड भी है। वहां उसकी सहयोगी पार्टी एजेएसयू अलग चुनाव लड़ रही है। झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और आरजेडी मिलकर चुनाव मैदान में हैं। बीजेपी को अपने दम पर बहुमत मिलने की उम्मीद काफी कम है। चुनाव बाद सबसे बड़ी पार्टी रहने के बावजूद वहां उसे एक बार फिर सरकार बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। उसके बाद दिल्ली और बिहार में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति बनने के आसार हैं। वैसे भी बीजेपी को सोचना पड़ेगा कि इधर हाल के वर्षों में जितने राज्यों के चुनाव हुए उन सब में उसे पहले के मुकाबले कम सीटें आखिर क्यों मिलीं? क्यों उसे हमेशा जोड़-तोड़ या विधायकों की हेराफेरी करके सरकार बनानी पड़ रही है?

दूर होते सहयोगी
राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हरियाणा और अब महाराष्ट्र- सबकी कहानी तकरीबन एक जैसी है।  ईडी, सीबीआई के सहारे बहुत दिनों तक राजनीति नहीं की जा सकती। अयोध्या, धारा 370, सर्जिकल और एयर स्ट्राइक, हिंदू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान की चुनावी धार भी धीरे-धीरे कम हो सकती है। लोगों की परेशानियां और बड़े पैमाने पर खत्म हो रही नौकरियां बड़े संकट की ओर इशारा करने लगी हैं। अपने को अजेय समझने वाली बीजेपी के लिए चुनौतियां निश्चय ही बढ़ गई हैं।
साभार

Sunday, 17 November 2019

कानूनी अधिकार संगठन की बैठकआगामी शिविर हेतु

 आज दिनांक 17 नवंबर 2019 रविवार को नोएडा के सेक्टर 104 कानूनी अधिकार संगठन के कार्यालय में आगामी शिविर कैंप की रणनीति तैयार करने हेतु एक बैठक आयोजित की गई जिसमें संगठन के फाउंडर मेंबर अधिवक्ता रण पाल अवाना, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रीना  राम  पत्रकार अजय शर्मा एवं अन्य सदस्य उपस्थित रहे. 
 बैठक का संचालन रवाना ने किया

जीवन संत गाडगे जी महाराज जैसा होना चाहिए: लोकेश चौधरी

   गाजियाबाद: महानगर कांग्रेस कमेटी कार्यालय कंपनी बाग पर संत गाडगे जी महाराज की जयंती पर चित्र पर पुष्प अर्पित कर विचार गोष्ठी की गई जिसमें...