Tuesday, 19 February 2019

नोएडा : पढ़ाई के लिए डांटने से नाराज 8वीं कक्षा के छात्र ने फांसी लगाई



नोएडा के बरौला गांव में पढ़ाई के लिए डांटने से नाराज होकर आठवीं कक्षा मेें पढ़ने वाले एक छात्र ने अपने घर के अंदर पंखे से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।

जानकारी के अनुसार, नोएडा के बरौला गांव में रहने वाले आठवीं कक्षा के छात्र जतिन चौहान (14 वर्षीय) ने सोमवार रात अपने घर के अंदर कथित तौर पर पंखे से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस ने बताया कि जतिन के परिजनों ने पढ़ाई को लेकर उसे डांट दिया था, जिसकी वजह से उसने पंखे से फंदा लगा लिया।

पुलिस उपाधीक्षक नगर (तृतीय) विमल कुमार सिंह ने बताया कि बरौला गांव में रहने वाले बिजेंदर चौहान का 14 वर्षीय बेटा जतिन चौहान आठवीं कक्षा में पढ़ता था। उन्होंने बताया कि सोमवार रात को पढ़ाई को लेकर जतिन के परिजनों ने उसको डांट दिया। इस बात से नाराज होकर उसने अपने घर पर छत के पंखे से फंदा लगा लिया।

सीओ ने बताया की गंभीर हालत में छात्र को उनके परिजनों ने सेक्टर-50 स्थित नियो अस्पताल में भर्ती कराया जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उन्होंने बताया कि पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।

नहीं रहे हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह



हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह का मंगलवार की मध्य रात्रि यहां अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स)  में निधन हो गया। वह 92 वर्ष के थे। नामवर सिंह गत एक माह से बीमार थे। उनका अंतिम संस्कार दोपहर तीन बजे लोधी रोड शव गृह में किया जाएगा। उनके परिवार में एक पुत्र और एक पुत्री है। उनकी पत्नी का निधन कई साल पहले हो गया था।

28 जुलाई 1926 को बनारस के गांव जीयनपुर (अब चंदौली) में पैदा हुए नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में काशी विश्वविद्यालय से एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल की। बाद में उन्होंने इसी विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी।

नामवर सिंह की गिनती देश के बड़े बुद्धिजीवियों तथा विद्वानों में होती थी। उनकी प्रमुख कृतियों में छायावाद,  दूसरी परम्परा की खोज, इतिहास और आलोचना, कहानी: नयी कहानी, हिन्दी  आधुनिक साहित्य की  प्रवृतियां, वाद विवाद संवाद प्रमुख हैं।

एक मई 1926 को उत्तर प्रदेश के जीयनपुर में जन्मे नामवर सिंह के निधन से हिन्दी साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है। साहित्य अकादमी जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ एवं जनसंस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। वह साहित्य अकादमी के फेलो भी थे।


नामवर सिंह को उनकी रचना 'कविता के नये प्रतिमान' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। वह जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्विद्यालय के कुलाध्यक्ष भी थे।

प्रसिद्ध लेखक अशोक वाजपेयी, निर्मला जैन, विश्वनाथ त्रिपाठी, काशी नाथ सिंह, ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडे, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, असगर वज़ाहत,  नित्यानंद तिवारी तथा मंगलेश डबराल जैसे लेखकों ने श्री सिंह के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है और हिन्दी साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।

भारत में रियल एस्‍टेट बिजनेस करने के लिए 7 आइडिया


भारत में रियल एस्‍टेट बिजनेस करने के लिए 7 आइडिया


अब तक शायद लोग यह समझ चुके होंगे कि रियल एस्‍टेट में कितना फायदा होता है। रियल एस्‍टेट में पैसे बनाने के कई तरीके हैं लेकिन शायद आप उनके बारे में नहीं जानते होंगे। तो चलिए कोई बात नहीं रियल एस्‍टेट का बिजनेस करने के लिए हम आपको ऐसे ही कुछ बिजनेस आइडिया बताएंगे जिससे आप जल्‍द से जल्‍द रियल एस्‍टेट के बिजनेस से जुड़कर लाखें की कमाई कर सकेंगे।


मकान मालिक बनें : आपके खुद के नाम पर अगर कोई प्रॉपर्टी है तो आप लैण्‍डलॉर्ड यानी कि मकान मालिक बन सकते हैं और इससे आप दो तरीके से पैसे कमा सकते हैं। पहला तो यह कि आप हर महीने किरायेदार से किराया लेकर कमाई कर सकते हैं। तो दूसरा तरीका है प्रॉपर्टी सेलिंग के द्वारा पैसे कमाना।


फ्लिप प्रॉपर्टी: फ्लिप प्रॉपर्टी का मतलब है कि खस्‍ता हालत में किसी घर या बिल्डिंग को खरीदकर उसे मार्डन तरीके से बनाकर फिर बेचना या रेंट पर देना। रियल एस्‍टेट का यह बिजनेस आइिडया अब भारत में भी धीरे-धीरे जोर पकड़ रहा है। फ्लिप प्रॉपर्टी से आप अपनी कमाई डायरेक्‍ट डबल कर सकते हैं।


रियल एस्‍टेट: एजेंट बनें रियल एस्‍टेट बिजनेस आइडिया में तीसरा तरीका है रियल एस्‍टेट एजेंट बनना। रियल एजेंट बनकर आप प्रॉपर्टी डीलिंग का काम कर सकते हैं। आप ब्रोकर के सहायता से और रियल एस्‍टेट एजेंसियों की सहायता से बड़े-बड़े बिल्डिंग्‍स और अपार्टमेंट की डील करके उसे अच्‍छे दाम में बेच सकते हैं। लेकिन रियल एस्‍टेट एजेंट बनने के लिए आपको कुछ डिग्री और और सर्टिफिकेट लेने की आवश्‍यकता होगी।


रियल एस्‍टेट फोटोग्राफर: आप रियल एस्‍टेट में अगर रुचि रखते हैं तो रियल एस्‍टेट की फोटोग्राफी करके एक अच्‍छा और जाना-माना फोटोग्राफर भी बन सकते हैं। भारत में भी यह धीरे-धीरे शुरु हो रहा है। एक रियल एस्‍टेट फोटोग्राफर के तौर पर आप प्रॉपर्टी सेलर या मकान मालिक के ऑर्डर पर उनकी प्रॉपर्टी की फोटो उन्‍हें दे सकते हैं जो कि प्रॉपर्टी की ऑनलाइन साइट पर सेल्‍स मटेरियल के तौर पर काम आती हैं। बड़े-बड़े घरों के लिए कई सारी फोटोग्राफ की जरुरत होती है तो ऐसे में आप अच्‍छी खासी कमाई कर सकते हैं।


जमीन का व्‍यापार: भू-व्यापार व्यवसाय या लॉन की देखभाल कृषि आधारित सेवा उद्योग में सबसे अधिक आकर्षक व्यवसायों में से एक है। यह सुकून भरा बिजनेस आप घर से भी कर सकते हैं। इस बिजनेस के लिए अच्‍छा कम्‍यूनिकेशन स्किल और बिजनेस के बारे में थोड़ी जानकारी होनी आवश्‍यक है।

प्रॉपर्टी मैनेज करने का काम यह एक बहुत ही आसान और सरल तरीका है रियल एस्‍टेट बिजनेस से पैसा कमाने का। जी हां प्रॉपर्टी मैनेजमेंट का काम ज्‍यादातर बढ़े-बढ़े शहरों में दिया जाता है। जिसके अंतर्गत प्रॉपर्टी मैनेजर को मेंटेनेंस, रेंट कलेक्‍शन और ओनर के तबादले आदि को देखता है।


कंस्‍ट्रक्‍शन मैनेजमेंट का काम: कंस्‍ट्रक्‍शन मैनेजमेंट का काम रियल एस्‍टेट बिजनेस में एक और फायदे का काम है। अगर आपके पास कंस्‍ट्रक्‍शन की जानकारी और सिविल बैकग्राउण्‍ड है तो आप यह काम कर सकते हैं और पैसे भी कमा सकते हैं। इस बिजनेस में बिल्डिंग ब्रांड बहुत ही जरुरी है।



2020 तक शुरु हो जाएगा 1 करोड़ घर बनाने का काम

प्रधानमंत्री आवास के तहत 2022 तक सभी को घर देने का लक्ष्‍य रखा है। यह उनकी महत्‍वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। इस लक्ष्‍य को पूरा करने के लिए केंद्रीय आवासीय और शहरी विकास मंत्रालय ने 2018 में कई योजनाओं की शुरुआत की। इसके तहत 2020 से पहले 1 करोड़ घर के निर्माण का काम शुरु करने का लक्ष्‍य है।

शहरी विकास मंत्रालय पर इसके अलावा स्‍वच्‍छ भारत मिशन, स्‍मार्ट सिटी प्रोजेक्‍ट, नेशनल हेरिटेज सिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम, अटल मिशन जैसी कई योजनाओं को पूरा करने की जिम्‍मेदारी है। एक अधिकारी के अनुसार अप्रैल 2018 से अब तक पूरे देश के 1612 शहरों को खुले में शौच मुक्‍त घोषित किया गया है। स्‍वच्‍छ भारत अभियान के तहत अब तक कुल 4124 शहरों और गांवों को खुले में शौच मुक्‍त घोषित किया जा चुका है।

बता दें कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अब तक 68.5 लाख घरों के निर्माण को मंजूरी मिल चुकी है। इनमें से 35.67 लाख घरों का निर्माण जारी है, जिनमें 12.45 लाख घरों का निर्माण काम पूरा कर लेने से 2022 तक सभी को घर आवंटित कर दिए जाएंगे। आपको बता दें कि पीएम आवास योजना का बजट करीब 3 लाख 56 हजार 397 करोड़ है, इसमें केंद्र सरकार की ओर से 33 हजार 455 करोड़ रुपए अलग-अलग राज्‍य और केंद्र शासित प्रदेश को आवंटित किया जा चुका है। फिलहाल, आवंटित राशि 1 लाख 275 करोड़ है।


प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के लिए कौन आवेदन कर सकता है?

यदि आप भी गांव क्षेत्र से संबंध रखते हैं तो आप भी प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना (PMGAY) के तहत लोन के माध्‍यम से घर ले सकते हैं या घर की मरम्‍मत करा सकते हैं। अगर आप इस योजना के तहत होम लोन लेते हैं तो आपको लोन पर 3 प्रतिशत की सब्सिडी भी मिलती है। तो चलिए आपको बताते हैं कि प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत लोन के लिए कौन-कौन आवेदन कर सकते हैं?


MGAY के लिए आवेदन करने योग्‍य व्‍यक्ति यहां पर आपको PMGAY के तहत लोन के लिए योग्‍य व्‍यक्तियों की सूची बताएंगे: अनुसूचित जाति/जनजाति के लोग  मुक्‍त बंधुआ मजदूर  बीपीएल श्रेणी में आने वाले अल्‍पसंख्‍यक या अन्‍य परिवार  विधवा, सेना के शहीद जवानों के परिजन, रिटायर्ड जवान  PMGAY के तहत लोन आवेदन करने वाले व्‍यक्ति का परिवार होना जरुरी है।  लोन लेने वाले परिवार के पास पहले से पक्‍का मकान नहीं हो आवेदक EWS, LIG या बीपीएल कैटेगरी में आता हो आवेदक के परिवार की आमदनी 3 से 6 लाख रुपए के बीच हो यदि आवेदक 6 लाख रुपए से अधिक का होम लोन लेता है तो उसे इससे अधिक राशि पर बाजार में चल रहे ब्‍याज दर के हिसाब से ही किस्‍त भरना होगा।

प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के लिए जरुरी दस्‍तावेज पीएमजीएवाई का आवेदन फॉर्म  आय प्रमाण पत्र  आधार, पैन, वोटर आईडी कार्ड,  एड्रेस प्रूफ  बैंक स्‍टेटमेंट  कारोबारी के मामले में कारोबार की प्रकृति, वित्‍तीय स्‍टेटमेंट  कंस्‍ट्रक्‍शन प्‍लान  कंस्‍ट्रक्‍शन की लागत का सर्टिफिकेट  वैल्‍युअर का सर्टिफिकेट  विल्‍डर या डेवलपर से किया गया एग्रीमेंट  संपत्ति का आवंटन प्रमाण पत्र

पीएमजीएवाई की लाभार्थी सूची पीएमजीएवाई के तहत लाभ पाने वाले आवेदक सरकार द्वारा चुने जाते हैं, यह सामाजिक आर्थिक जनगणना 2011 की मदद से तैयार किया जाता है। इस योजना में लाभार्थी चुनने की प्रक्रिया यहां पर बतायी जा रही है:

1. SECC की मदद से लाभार्थी का चयन किया जाता है। 2. इसके बाद आवेदकों की प्राथमिकता तय की जाती है। 3. आगे की प्रक्रिया में सूची को सत्‍यापित करने के लिए ग्राम सभा के पास भेजा जाता है। 4. इसके बाद ग्राम सभा से सत्‍यापित होने के बाद फाइनल लिस्‍ट बनती है और पब्लिश की जाती है। 5. और फिर सालाना सूची बनायी जाती है।

सूची में इस तरह से चेक करें अपना नाम

 प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत आवेदन करे के बाद सरकार लाभार्थियों का चुनाव करती है इसके बाद फाइनल लिस्‍ट वेबसाइट पर डाल दी जाती है। तो यदि आपका नाम सूची में है तो यहां पर जाकर आप अपना नाम चेक कर सकते हैं।


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जानिए क्या है RERA और कैसे यह रियल एस्टेट इंडस्ट्री और घर खरीददारों को करेगा प्रभावित

रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाने और घर खरीददारों के हितों की रक्षा करने के मकसद से रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डिवेलपमेंट एक्ट), 2016 (RERA) को लागू किया गया। आज हम आपको बता रहे हैं कि घर खरीददारों, बिल्डरों और ब्रोकर्स पर इसने क्या प्रभाव डाला है और इस कानून के तहत सजा का क्या प्रावधान है।

भारत सरकार ने 26 मार्च 2016 को रियल एस्टेट (रेगुलेशन और डिवेलपमेंट) एक्टर 2016 अधिनियमित किया और इसके सभी प्रावधान 1 मई, 2017 से लागू हो गए। सभी बिल्डर्स से कहा गया कि वे जुलाई 2017 तक अपने प्रोजेक्ट्स को RERA के तहत रजिस्टर कराएं। जो रियल एस्टेट एजेंट्स इसके दायरे में आते हैं, वे अब भी खुद को रजिस्टर कराने की प्रक्रिया में लगे हुए हैं। कई राज्यों को अब भी इस कानून के नियमों को नोटिफाई करना है और डिवेलपर्स/प्रमोटरों को अपने प्रोजेक्ट्स को RERA में रजिस्टर्ड कराना है।

क्या है RERA (रियल एस्टेट रेगुलेटरी एक्ट)
रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डिेवेलपमेंट एक्ट, 2016 (RERA) को भारतीय संसद ने पास किया था। RERA का मकसद घर ग्राहकों के हितों की रक्षा करना और रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश को बढ़ाना है। राज्य सभा ने RERA को 10 मार्च और लोकसभा ने 15 मार्च, 2016 को पास कर दिया था। 1 मई, 2016 को यह लागू हो गया। 92 में से 59 सेक्शंस 1 मई, 2016 और बाकी 1 मई, 2017 को अस्तित्व में आए। 6 महीने के भीतर केंद्र व राज्य सरकारों को अपने नियमों को केंद्रीय कानून के तहत नोटिफाई करना था।

क्यों जरुरी है RERA?
काफी वक्त से घर खरीददार इस बात की शिकायत कर रहे थे कि रियल एस्टेट की लेनदेन एकतरफा और ज्यादातर डिवेलपर्स के हक में थीं। RERA और सरकार के मॉडल कोड का मकसद मुख्य बाजार में विक्रेता और संपत्ति के खरीददार के बीच न्यायसंगत और सही लेनदेन तय करना है। उम्मीद की जा रही है कि RERA बेहतर जवाबदेही और पारदर्शिता लाकर रियल एस्टेट की खरीद को आसान बनाएगा। साथ ही राज्यों के प्रावधान केंद्रीय कानून की भावना को कमजोर नहीं करेंगे। RERA भारतीय रियल एस्टेट इंडस्ट्री का पहला रेगुलेटर है। रियल एस्टेट एक्ट के तहत यह अनिवार्य किया गया कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने रेगुलेटर और नियमों का गठन करेंगे, जिसके मुताबिक कामकाज होगा।

घर खरीददारों पर क्या होगा RERA का प्रभाव
कुछ अहम अनुपालन हैं:
कोई भी अतिरिक्त इजाफा या परिवर्तन के बारे में आवंटियों को सूचना देना।
किसी भी इजाफे या बदलाव के बारे में 2/3 आवंटियों की मंजूरी की जरूरत होगी।
RERA में रजिस्ट्रेशन से पहले किसी तरह का लॉन्च या विज्ञापन नहीं किया जाएगा।
अगर बहुमत अधिकार तीसरे पक्ष को ट्रांसफर किया जाना है तो 2/3 सहमति की जरूरत होगी।
प्रोजेक्ट प्लान, लेआउट, सरकारी मंजूरी और लैंड टाइटल स्टेटस और उप-ठेकेदारों की जानकारी साझा करना।
वक्त पर प्रोजेक्ट पूरा होकर ग्राहकों को मिल जाए, इस पर जोर दिया जाएगा।
पांच साल की दोष दायित्व अवधि के कारण कंस्ट्रक्शन की क्वॉलिटी में इजाफा।
ब्योरेवार समय या काफी फ्लैट्स बिक जाने के बाद आरडबल्यूए का गठन।

इस कानून का सबसे सकारात्मक पहलू है कि यह फ्लैटों, अपार्टमेंट आदि की खरीद के लिए एक एकीकृत कानूनी व्यवस्था मुहैया कराता है, साथ ही पूरे देश में उसका मानकीकरण करता है। अब आपको इस कानून की मुख्य बातों के बारे में बताते हैं:

रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना: रियल एस्टेट के लिए सही रेगुलेटर (जैसे कैपिटल मार्केट के लिए सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड अॉफ इंडिया) की जरूरत लंबे वक्त से थी। इस कानून के तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन किया जाएगा। इसका मकसद ग्राहकों के हितों की रक्षा, जमा किए डाटा को संग्रहित करना और मजबूत शिकायत निवारण प्रणाली बनाना है। समय की बर्बादी को रोकने के लिए प्राधिकरण को अधिकतम 60 दिनों के भीतर आवेदन का निपटारा करना अनिवार्य है। यह सीमा तभी बढ़ाई जा सकती है, अगर देरी का कोई कारण दर्ज हो। इसके अलावा रियल एस्टेट अपीलीय प्राधिकरण (REAT) में अपील की जा सकती है।

अनिवार्य रजिस्ट्रेशन: केंद्रीय कानून के मुताबिक सभी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स (जहां विकसित होने वाला कुल क्षेत्रफल 500 स्क्वेयर मीटर से ज्यादा है या किसी भी चरण में 8 से ज्यादा अपार्टमेंट्स बनने अनिवार्य हैं) का अपने राज्य के RERA में रजिस्टर्ड होना अनिवार्य है। जिन मौजूदा प्रोजेक्ट्स को कंप्लीशन सर्टिफिकेट (सीसी) या अॉक्युपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) जारी नहीं हुआ है, उन्हें भी इस कानून के तहत रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है। रजिस्ट्रेशन कराते वक्त प्रोमोटर्स को प्रोजेक्ट की जानकारी जैसे-जमीन की स्थिति, प्रोमोटर की जानकारी, अप्रूवल, पूरे होने का समय इत्यादि बतानी होगी। जब रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और सभी मंजूरियां मिल जाएंगी, तब प्रोजेक्ट की मार्केटिंग की जा सकती है।

रिजर्व अकाउंट: प्रोजेक्ट्स में देरी होने की सबसे मुख्य वजह है कि एक प्रोजेक्ट के लिए पैसा जमा कर उसे दूसरे प्रोजेक्ट में निवेश कर दिया जाता है। इस पर रोक लगाने के लिए प्रोमोटर्स को प्रोजेक्ट का 70 प्रतिशत पैसा अलग रिजर्व अकाउंट में रखना होगा। इस खाते की राशि को सिर्फ जमीन या निर्माण के कामों में खर्च किया जा सकता है। किसी पेशेवर से इसे सर्टिफाइड कराना भी जरूरी है।

प्रोजेक्ट की प्रोग्रेस देख सकेंगे ग्राहक: RERA के लागू होने के बाद घर खरीददार RERA की वेबसाइट पर प्रोजेक्ट की प्रोग्रेस मालूम कर सकेंगे। प्रोजेक्ट में कितना काम पूरा हुआ, इसकी जानकारी प्रोमोटर्स को नियमित अंतराल पर नियामक को देनी होगी।

टाइटल रिप्रेजेंटेशन: प्रोमोटर्स को अब सही टाइटल और जमीन पर रुचि के लिए सकारात्मक वॉरंटी बनानी होगी, जिसे बाद में घर खरीददार उनके खिलाफ इस्तेमाल कर सकते हैं। गलत टाइटल की खोज की जानी चाहिए। इसके अलावा उन्हें टाइटल और प्रोजेक्ट के कंस्ट्रक्शन के लिए इन्श्योरेंस भी हासिल करनी होगी, जिसका मुनाफा बिक्री समझौते के निष्पादन के बाद अलॉटी को दिया जाना चाहिए।

बिक्री समझौते का मानकीकरण: इस कानून के तहत प्रोमोटर्स और घर खरीददार के बीच बिक्री समझौते का मानक मॉडल है। मिसाल के तौर पर  प्रोमोटर्स ने घर खरीददारों के लिए कई धाराएं डालीं, जो उनके लिए सजा जैसी थीं, लेकिन प्रमोटर्स अगर कोई गलती करते थे तो उन पर कोई पेनाल्टी नहीं लगती थी। लेकिन एेसे क्लॉज अब बीते दिनों की बात हो जाएंगे और घर ग्राहकों को भविष्य में एक संतुलित अग्रीमेंट मिलेगा।

पेनाल्टी: इस कानून का उल्लंघन न हो, इसके लिए सख्त जुर्माने (प्रोजेक्ट की लागत का 10 प्रतिशत) का प्रावधान है।

RERA के तहत कारपेट एरिया की परिभाषा:
प्रॉपर्टी का एरिया तीन तरीकों से कैलकुलेट किया जाता है-कारपेट एरिया, बिल्ड-अप एरिया और सुपर बिल्ड-अप एरिया। इसलिए जब भी बात प्रॉपर्टी खरीदने की आती है तो आप क्या चुकाएंगे और आपको क्या मिलेगा, इसके बीच काफी फर्क होता है। महाराष्ट्र RERA के चेयरमैन गौतम चटर्जी ने कहा, अब यह सभी बिल्डर्स के लिेए अनिवार्य है कि वे अपार्टमेंट का साइज कारपेट एरिया (चार दीवारों के बीच का एरिया) के आधार पर बताएं। इस्तेमाल होने वाले इल एरिया में टॉयलेट एवं किचन भी शामिल होंगे। इससे पारदर्शिता आएगी, जो पहले नहीं थी।
RERA के मुताबिक कारपेट एरिया किसी अपार्टमेंट का इस्तेमाल होने वाला एरिया होता है, जिसमें बाहरी दीवारों का एरिया, सर्विस शाफ्ट, बालकनी और वरांडा एरिया शामिल नहीं होते। फ्लैट के अंदर की दीवारों का एरिया इसका हिस्सा होता है।

 RERA की गाइडलाइंस के मुताबिक, बिल्डर को सटीक कारपेट एरिया की जानकारी देनी होगी, ताकि ग्राहकों को यह पता चल सके कि वह किसके लिए भुगतान कर रहे हैं। लेकिन कानून के तहत बिल्डरों को कारपेट एरिया के आधार पर फ्लैट बेचना अनिवार्य नहीं है।

रियल एस्टेट इंडस्ट्री पर RERA का असर:
शुरुआती बैकलॉग
प्रोजेक्ट की बढ़ी हुई लागत
चुस्त नकदी
पूंजी की लागत में इजाफा
एकत्रीकरण
प्रोजेक्ट लॉन्च टाइम में बढ़ोतरी

शुरुआती तौर पर मौजूदा और नए प्रोजेक्ट्स के रजिस्ट्रेशन पर काफी काम करना होगा। पिछले पांच वर्षों में पूरे हुए प्रोजेक्ट्स का स्टेटस, प्रोमोटर की जानकारी, विस्तृत निष्पादन योजना तैयार करने की जरूरत है।
RERA के आने से घर खरीद से जुड़े सभी विवादों का निपटारा स्टेट रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी और रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल करेगा। एेसे मामलों के लिए सिविल कोर्ट या कंज्यूमर फोरम का सहारा नहीं लिया जाएगा। मामलों के तेजी से निपटारे के लिए RERA ने मूल सिद्धांत तय किए हैं। इसकी सफलता वक्त पर विवादों का निपटारा करने वाली संस्थाओं का गठन और कैसे इन विवादों को सुलझाया जाएगा, इस पर निर्भर करेगा।

राज्यों में RERA
31 जुलाई, 2017 को 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) ने अपने स्थायी और अंतिम रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना की। RERA के तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में खुद का रेगुलेटर होना चाहिए। जब तक बिल्डर अपना मौजूदा या आने वाला प्रोजेक्ट राज्यों के स्थायी या अंतरिम रेगुलेटर में रजिस्टर्ड नहीं कर देते, वे उसका प्रचार नहीं कर सकते। जिन प्रोजेक्ट्स को ओसी नहीं मिला था, उनके लिए आखिरी तारीख 31 जुलाई, 2017 थी।

आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने कहा कि गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पंजाब ने अपने स्थायी रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण का गठन कर लिया है, जबकि 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अंतरिम प्राधिकरण बना चुके हैं। केवल 23 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने कानून के नियमों को नोटिफाई किया है, जबकि 6 राज्यों ने नियमों को ड्राफ्ट कर लिया है, लेकिन नोटिफाई नहीं। कुल 9 राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों ने रियल एस्टेट कानून के तहत अंतरिम अपीलीय न्यायाधिकरण नियुक्त किया है जबकि केवल सात राज्यों ने अधिनियम के तहत ऑनलाइन पंजीकरण शुरू कर दिया है।

महाराष्ट्र RERA: महाराष्ट्र रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण (MahaRERA) 1 मई, 2017 को अस्तित्व में आया था। बिल्डर्स और रियल एस्टेट एजेंट्स को अपने नए और मौजूदा प्रोजेक्ट्स को रजिस्टर्ड कराने के लिए 90 दिनों की मोहलत दी गई।

सुलह व्यवस्था शुरू करने वाला पहला राज्य बना महाराष्ट्र: इस राज्य के परेशान घर खरीददार बिल्डर के साथ अपने विवादों का जल्द निपटारा कर पाएंगे, क्योंकि महाराष्ट्र RERA के सेक्शन 32 (जी) के वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) के तहत सुलह व्यवस्था शुरू करने वाला पहला राज्य बन गया है। यह सुलह व्यवस्था 1 फरवरी, 2018 से शुरू हो गई है और सुलह कराने वाली बेंच मार्च के पहले हफ्ते में सुनवाई शुरू कर सकती है। कोई भी परेशान आवंटी या प्रोमोटर (RERA में परिभाषित) महाराष्ट्र रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण के तहत सुलह व्यवस्था का आह्वान कर सकता है। इसके लिए एक वेबसाइट बनाई गई है, जिसे MahaRERA की वेबसाइट के जरिए भी चलाया जा सकता है।

उत्तर प्रदेश RERA: नियमों को नोटिफाई कर दिया गया है और राज्य के RERA की वेबसाइट 26 जुलाई, 2017 को लॉन्च की गई थी।
कर्नाटक RERA: कर्नाटक RERA नियम, 2016 को कैबिनेट ने 5 जुलाई, 2017 को मंजूरी दी थी।
तमिलनाडु RERA: प्राधिकरण के नियमों को 22 जुलाई, 2017 को नोटिफाई किया गया। रजिस्ट्रेशन के लिए प्रोजेक्ट्स को शामिल या बाहर करना इस बात  पर निर्भर करेगा कि क्या वे चेन्नई मेट्रोपॉलिटन एरिया (सीएमए) के अंदर आते हैं या नहीं।
हरियाणा RERA: राज्य की कैबिनेट ने प्राधिकरण के नियमों को 25 जुलाई, 2017 को मंजूरी दी थी।
राजस्थान RERA: राज्य के नियामक प्राधिकरण के नियमों को नोटिफाई कर दिया गया है और वेबसाइट 1 जून, 2017 को लॉन्च हो गई थी। राज्य ने अंतरिम नियामक प्राधिकरण के रूप में शहरी विकास और आवास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और अंतरिम अपीलीय न्यायाधिकरण के रूप में खाद्य सुरक्षा अपीलीय ट्रिब्यूनल को नामित किया है।
दिल्ली RERA: दिल्ली RERA के नियमों को भी नोटिफाई कर दिया गया है। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के उपाध्यक्ष को RERA के तहत नियामक प्राधिकरण के रूप में नामित किया गया है।
तेलंगाना RERA: तेलंगाना सरकार ने RERA के नियमों को 31 जुलाई, 2017 को नोटिफाई किया था। राज्य के नियमों को तेलंगाना राज्य रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) नियम, 2017 कहा जाएगा। ये नियम उन सभी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पर लागू होंगे, जिनकी बिल्डिंगों को संबंधित प्राधिकरण ने 1 जनवरी 2017 को या उसके बाद मंजूरी दी है।
पश्चिम बंगाल RERA: पश्चिम बंगाल आवास उद्योग विनियमन विधेयक 2017 राज्य विधानसभा द्वारा 16 अगस्त, 2017 को पारित किया गया था। नोटिफाई किए जाने के बाद 500 स्क्वेयर मीटर से ज्यादा और 8 अपार्टमेंट वाले  सभी आवासीय प्रोजेक्ट्स को राज्य नियामक आवास उद्योग विनियमन विधेयक (HIRA) के पास रजिस्टर कराना पड़ेगा।

RERA के तहत कौन से प्रोजेक्ट्स आएंगे:
प्लॉटेड डिवेलपमेंट के अलावा कमर्शियल और रिहायशी प्रोजेक्ट्स
500 स्क्वेयर मीटर से ज्यादा या 8 यूनिट्स वाले प्रोजेक्ट्स।
कानून के लागू होने से पहले बिना कंप्लीशन सर्टिफिकेट वाले प्रोजेक्ट्स।
जिस प्रोजेक्ट का मकसद रेनोवेशन, रिपेयर, री-डिवेलपमेंट है और पुन: आवंटन, मार्केटिंग, विज्ञापन, नए अपार्टमेंट्स की बिक्री या नया आवंटन नहीं करना है, वह RERA के तहत नहीं आएंगे।
हर चरण को नया रियल एस्टेट प्रोजेक्ट माना जाएगा, जिसके लिए नया रजिस्ट्रेशन होगा।

किन चीजों पर बिल्डर को माननी होगी RERA की बात:
प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन
विज्ञापन
निकासी – पीओसी विधि
कारपेट एरिया
वेबसाइट अपडेशन/भंडाफोड़
प्रोजेक्ट में बदलाव-2/3 अलॉटीज की मंजूरी
प्रोजेक्ट अकाउंट्स-अॉडिट
अलॉटी से लिया गया 70 प्रतिशत फंड प्रोजेक्ट के अकाउंट में जमा कराना होगा। इसका इस्तेमाल सिर्फ निर्माण और जमीन की लागत को कवर करने के लिए होगा।
पर्सेंटेज कंप्लीशन मेथड के अनुपात में निकासी होगी।
निकासी किसी इंजीनियर, आर्किटेक्ट या सीए द्वारा सर्टिफाइड होनी चाहिए।
गैर-अनुपालन पर प्रोजेक्ट के बैंक खाते फ्रीज करने के RERA के प्रावधान।
देरी पर ब्याज कंज्यूमर और प्रोमोटर दोनों के लिए एक समान होगा।
RERA के तहत बिल्डर को क्या-क्या जानकारियां देनी होंगी:
नंबर, टाइप और अपार्टमेंट का कारपेट एरिया।
किसी भी बड़े इजाफे या बदलाव के लिए प्रभावित आवंटियों से सहमति।
ना बिक पाने वाली इन्वेंट्री या लंबित मंजूरियों जैसी जानकारियों को हर तिमाही में RERA की वेबसाइट पर अपडेट करना।
तय वक्त में प्रोजेक्ट पूरा करना।
विज्ञापन में झूठे बयान या कमिटमेंट नहीं करना।
प्रोमोटर मनमाने ढंग से यूनिट को रद्द नहीं कर सकता।

RERA के तहत कैसे रजिस्टर कराएं प्रोजेक्ट्स:
RERA के तहत प्रोजेक्ट का रजिस्ट्रेशन कराते वक्त सभी मंजूरियों का प्रमाणपत्र, प्रारंभिक प्रमाणपत्र, मंजूर किया गया प्लान, लेआउट प्लान,  स्पेसिफिकेशन, विकास कार्य का प्लान, प्रस्तावित सुविधाएं, अलॉटमेंट लेटर, सेल अग्रीमेंट और कन्वेयंस डीड पेश करने पड़ते हैं।
नए और मौजूदा प्रोजेक्ट्स का लॉन्च से पहले RERA के तहत रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है।
RERA और RERA अपीलीय ट्रिब्यूनल में विवाद का 6 महीने में निपटारा।
एक ही प्रोजेक्ट के विभिन्न चरणों का अलग-अलग रजिस्ट्रेशन होगा।
डिवेलपर्स को RERA को पिछले 5 वर्षों में लॉन्च हुए प्रोजेक्ट का उनके स्टेटस के साथ ब्योरा दोना होगा। साथ ही बताना होगा कि देरी क्यों हुई।
RERA की वेबसाइट पर अपडेट।
अगर डिवेलपर की गलती नहीं है और देरी हुई है तो अधिकतम 1 साल का एक्सटेंशन लिया जा सकता है।
सीए द्वारा प्रोजेक्ट के अकाउंट का सालाना अॉडिट।
आरडब्ल्यूए के फेवर में कॉमन एरिया का कन्वेयंस डीड।
निर्माण और लैंड टाइटल का इंश्योरेंस।
प्रोजेक्ट के पूरा होने की समयावधि।

निर्माण और जमीन के टाइटल के लिए बीमा लागत को RERA कैसे प्रभावित करेगा?

आंतरिक संचय से भूमि और मंजूरी की लागत को बाहर किया जाएगा क्योंकि प्रीलॉन्च का कॉन्सेप्ट खत्म हो जाएगा। वर्तमान ऋण वित्तपोषण की जगह इक्विटी वित्तपोषण ले लेगा।
पूंजी की लागत में बढ़ोतरी हो सकती है, क्योंकि डिवेलपर्स को अब जमीन और मंजूरी की लागत के लिए फंड इक्विटी के जरिए जुटाना होगा।
मंजूरी मिलने में देरी के कारण डिवेलपर्स के लिेए ऋण वित्तपोषण सही रास्ता नहीं रह गया है। चूंकि इस सेक्टर में आना मुश्किल हो गया है, इसलिए एकत्रीकरण की संभावना है।
कोई प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए मजबूत वित्तीय और निष्पादन क्षमता की जरूरत होगी।
प्रोजेक्ट लॉन्च करने का समय बढ़ सकता है क्योंकि विवरण को अंतिम रूप देने में बहुत समय लगेगा।
ड्राइंग, यूटिलिटी लेआउट आदि जैसे विवरणों को प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले अंतिम रूप देना होगा।

रियल एस्टेट एजेंट्स पर क्या होगा RERA का असर:
रियल एस्टेट (रेग्युलेशन एंड डिेवेलपमेंट एक्ट), (RERA) के तहत रियल एस्टेट एजेंटों को लेनदेन की सुविधा के लिए खुद को रजिस्टर्ड कराना होगा। भारत में ब्रोकर्स का सेगमेंट करीब 4 बिलियन डॉलर की इंडस्ट्री है। पूरे देश में 5 से 9 लाख ब्रोकर्स हो सकते हैं। हालांकि यह पारंपरिक रूप से असंगठित और अनियमित हैं।
आरई/मैक्स इंडिया के चेयरमैन और फाउंडर सैम चोपड़ा ने कहा, यह इंडस्ट्री में जवाबदेही लाएगा, क्योंकि जो पेशेवर और पारदर्शी बिजनेस में यकीन करते हैं, वे पूरा फायदा उठा ले जाएंगे। अब एजेंट्स का रोल और अहम हो जाएगा, क्योंकि उन्हें ग्राहक को सही जानकारी और RERA के तहत रजिस्टर्ड डिवेलपर चुनने में मदद भी करनी होगी।
RERA के आने के बाद ब्रोकर्स किसी भी एेसी सुविधा या सेवा का वादा नहीं कर सकते, जो दस्तावेज में न लिखी हो। इतना ही नहीं, उन्हें बुकिंग के वक्त ग्राहकों को पूरी जानकारी और दस्तावेज मुहैया कराने होंगे। RERA को गैरजिम्मेदाराना और अनुभवहीन ब्रोकर्स की पहचान करनी होगी, क्योंकि नियम से न चलने वाले दलालों को भारी जुर्माना, जेल या दोनों हो सकते हैं।

एजेंट्स को RERA की इन बातों को मानना पड़ेगा:
1. सेक्शन 3-RERA में रजिस्ट्रेशन कराए बिना प्रमोटर बिक्री के लिए विज्ञापन, किताब या बिक्री की पेशकश नहीं कर सकता।
2.सेक्शन 9 : RERA रजिस्ट्रेशन के बिना कोई एजेंट किसी प्रोजेक्ट को नहीं बेच सकता।
-जो भी बिक्री एजेंट करेंगे, उसमें उनका RERA नंबर भी लिखा होगा।
-रजिस्ट्रेशन को रिन्यू भी कराना होगा।
-अगर नियमों का उल्लंघन किया गया तो रजिस्ट्रेशन रद्द या ब्लॉक किया जा सकता है।
3. सेक्शन 10– कोई एजेंट बिना रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट को नहीं बेच सकता।
-किताबें और रिकॉर्ड बनाए रखें।
-व्यापार की गलत नीतियों में शामिल न हों।
-कोई गलत बयान-मौखिक, लिखित, विजुअल
-विशेष मानक वाली सर्विसेज का प्रतिनिधित्व
-प्रतिनिधित्व करें कि प्रोमोटर या खुद के पास अप्रूवल या संबंधन है।
-अखबार में विज्ञापन के प्रकाशन को अनुमति देना और गलत सेवाओं की पेशकश नहीं करना।
-ग्राहकों को बुकिंग के वक्त सभी डॉक्युमेंट्स मुहैया कराना।

एेसे दर्ज कराएं RERA में शिकायत:
आरआईसीएस के पॉलिसी हेड दिग्बिजॉय भौमिक ने कहा, रियल एस्टेट रेग्युलेशन एक्ट 2016 के सेक्शन 31 के तहत रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी या निर्णायक अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। ऐसी शिकायतें प्रमोटरों, आवंटियों या रियल एस्टेट एजेंटों के खिलाफ हो सकती हैं। ज्यादातर राज्यों के नियमों में RERA को अपरिवर्तनीय बनाया गया है, जिसमें फॉर्म और प्रक्रिया है। इसके तहत आवेदन किया जा सकता है। चंडीगढ़ केंद्रशासित प्रदेश या उत्तर प्रदेश के मामले में इन्हें फॉर्म एम या फॉर्म एन कहा गया है। (ज्यादातर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मामलों में भी एेसा ही है)

राज्यों के RERA के तहत शिकायतें तय फॉर्म के रूप में होनी चाहिए। RERA के तहत पंजीकृत प्रोजेक्ट अगर नियमों का उल्लंघन करते हैं तो तय समय सीमा के भीतर उनके खिलाफ इस कानून के प्रावधानों के तहत शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। एसएनजी एंड पार्टनर्स लॉ फर्म में पार्टनर अजय मोंगा ने कहा, ”जिन लोगों ने एनसीडीआरसी में शिकायतें दर्ज कराई हैं, वह उन्हें वापस लेकर RERA में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। अन्य अपराध (धारा 12, 14, 18 और 19 के तहत शिकायतें छोड़कर) RERA प्राधिकरण के सामने दायर की जा सकती हैं”।

RERA के फायदे:
इंडस्ट्री गवर्नेंस और पारदर्शिता
प्रोजेक्ट की  योग्यता और वितरण
मानकीकरण एवं क्वॉलिटी
निवेशकों का बढ़ेगा भरोसा
ज्यादा निवेश को बढावा और पीई फंडिंग
नियामक वातावरण

डिवेलपर:
कॉमन और बेस्ट प्रैक्टिस
बेहतर कार्यकुशलता
सेक्टर का एकत्रीकरण
कॉरपोरेट ब्रैंडिंग
ज्यादा इन्वेस्टमेंट
अॉर्गनाइज्ड फंडिंग में बढ़ोतरी
खरीददार
ग्राहकों के हितों की सुरक्षा
क्वॉलिटी उत्पाद और समय पर डिलिवरी
संतुलित अग्रीमेंट्स और  ट्रीटमेंट
पारदर्शिता-कारपेट एरिया के  आधार पर बिक्री
पैसे की सुरक्षा और उपयोगिता पर पारदर्शिता
एजेंट्स
सेक्टर का एकत्रीकरण (अनिवार्य स्टेट रजिस्ट्रेशन की वजह से)
बेहतर पारदर्शिता
बेहतर कार्यकुशलता
शानदार प्रथाओं को अपनाने से कम मुकदमेबाजी

राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ का ग्रेजुएट बेरोजगार नवयुवक राजू

1955 में आयी राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ का वह आरंभिक दृश्य जब ग्रेजुएट बेरोजगार नवयुवक राजू ‘मेरा जूता है जापानी…’ गाता हुआ काम की तलाश में इलाहाबाद से सपनों के शहर बंबई चला आया है। भागती-दौड़ती लोकल ट्रेनें, सड़कों का ट्रैफिक, मिलों की चिमनियां, शानदार बिल्डिंगें और गरीबों के फुटपाथ। वह पचास के दशक की शहरी आधुनिकता थी। फटेहालों और वंचितों के बीच उम्मीद, हमदर्दी और मानवीयता के वे दृश्य। नेहरू युग की एक सपनीली आधुनिकता। लेकिन 90 के दशक के अंत में आई सईद मिर्जा की फिल्म ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ का वह बेरोजगार युवक नायक अब ‘लुंपेन’ बन चुका है। उसके पास कोई आदर्श नहीं, कोई सपना नहीं, कोई रोजगार नहीं और जीने के लिए पूरी एक जिंदगी पड़ी है।

यह बाबरी मस्जिद ढहने के बाद की मुंबई है। ग्लोबल समय, वैश्विक पूंजी का आगमन, विकास के मिथक, धर्म और मजहब के नाम पर बंटी हुई राजनीति और तेजी से फैलता हुआ एक अंडरवर्ल्ड। सलीम शहर की एक मुस्लिम बस्ती का फटेहाल बाशिंदा है। शहर की फिजा तेजी से बिगड़ रही है। उसे हर पल, हर लम्हा महसूस होता है कि इस शहर पर कोई बड़ी कयामत आने वाली है और सब चीजें हाथ से निकल रही हैं। कुछ अज्ञात भय, कुछ अव्यक्त आशंकाएं, हाशिए की एक जिंदगी और भागने के लिए कोई रास्ते नहीं। राज कपूर की आजादी के बाद की पचास के दशक ‘श्री 420’ से लेकर ग्लोबल इकॉनमी वाले नए समय की सईद मिर्जा की फिल्म ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ तक इन पचास वर्षों में हमारे सिनेमा में शहर का लैंडस्केप बदलता गया और तनावों की शक्ल भी। लोकप्रिय सिनेमा ने जाने-अनजाने इस बदलते हुए शहर के किसी बुनियादी ‘नरेटिव’ को रचा है।

शहरी आधुनिकता का एक पुराना एकीकृत मिथक आज लगभग खो चुका है। श्रम शक्ति बिखर चुकी है। मिलों की चिमनियों ने धुंआ उगलना बंद कर दिया है । कामगार बस्तियां उजड़ चुकी हैं। बंबई अब मुंबई बन चुका है। संकीर्ण क्षेत्रीयता और प्रांतवाद की राजनीति। हिंदुत्ववादी नारे। ग्रासरूट स्तर पर धर्म और मजहब की विभाजक रेखाएं। एक तरफ सेवा क्षेत्र की चमक-दमक, उपभोग की संस्कृति, गगनचुंबी इमारतें, नया मध्य वर्ग और दूसरी तरफ बदहाली, अपराध, बुनियादी सुविधाओं से महरूम अनाधिकृत झोंपड़पोट्टियां और मुख्यधारा के जीवन से एक सतत निर्वासन। एक ही शहर के भीतर ये दो समानांतर संसार। जुर्म की शक्लें बदल गयी हैं और उनमें गजब की कशिश है। वे अब हेडलाइंस हैं और उनमें कैद समय, जो किसी बॉलिवुड फिल्म में सनसनी, उत्तेजना, गैंगवार के दृश्यों की चाशनी में लिपटा हुआ ‘टाइप्ड’ चरित्रों के माध्यम से मनोरंजन का एक नया मसाला भी बन जाता है क्योंकि इन सामाजिक विभेदों को हमने कहीं स्वीकार कर लिया है। घनी बस्तियां, वह माहौल, वे चरित्र, गुजर-बसर के लिए शहरों की तरफ आई आबादी का वह निर्वासन और उनके चारों तरफ की एक बेरहम दुनिया। एक जगमगाते आधुनिक कहलाने वाले शहर के विरोधाभासों ने जिस तरह से लोकप्रिय सिनेमा में एक सामूहिक अवचेतन से उठाया है, वह महत्वपूर्ण है।

भायखला, नागपाड़ा, कमाठीपुरा, पास्ता लेन, मझगांव, माहिम दरगाह, बेहरामपाड़ा, जोगेश्वरी, मिल्लत नगर, गोवंडी, चीता कैंप, मानखुर्द, किदवई नगर से लेकर मालवणी और मुंब्रा तक इस शहर में वे जगह-जगह निर्वासित और हाशिये की जिंदगियों वाले कुछ खास इलाके हैं। 1993 के सांप्रदायिक दंगों के बाद वहां धीरे-धीरे एक ‘घेट्टो संस्कृति’ ने जन्म लिया। वे मुख्यधारा से कटे हुए इलाके, जो नब्बे के दशक के आर्थिक उदारवाद, ग्लोबल इकॉनॉमी और बाजार-समय के परिपार्श्व को रचते हैं। महेश मांजरेकर से लेकर अनुराग कश्यप तक दर्जनों बॉलिवुड सिनेमा निर्देशकों की फिल्मों में वे मोहल्ले और उनका वह परिवेश बदलती हुई संवेदना का एक आंतरिक संसार बन गए हैं। इन बस्तियों का सच जैसे कि एक तड़के हुए आईने में कुछ खंडित छवियां। एक तरफ 90 के बाद का यह सूचना समय, संचार प्रौद्योगिकी, सेवा क्षेत्र, वैश्विक अर्थव्यवस्था, बाजार, उपभोक्ता संस्कृति, शॉपिंग मॉल, फ्लाइ ओवर और गगनचुंबी टॉवर तथा इन्हीं के समानांतर वह दूसरा समय, दूसरा पर्यावरण, दूसरा संसार जो इसी शहर में उभरा है।



सिनेमा अपने समय की छवियों को रचता है। 70 के दशक में ‘दीवार’ फिल्म ने बड़े नाटकीय ढंग से शहर के इस नरेटिव को बदल था। ‘दीवार’ के उस परिश्रमी नायक के पास अब कोई आदर्श नहीं बचा है। भीतर एक धधकती हुई आग, छितरे हुए संबंध और हाशिए का वजूद। डॉक और मिलों के बड़े-बड़े खाली पड़े गोदाम और शहर के तलघर में किसी तरह जीवित बचे रहने की वह बेबसी। यह वंचित नायक 80 के दशक में ‘वास्तव’ जैसी फिल्म में एक संगठित अंडरवर्ल्ड का गैंगस्टर बन गया है। अब उसके चारों तरफ यह पुराना औद्योगिक शहर नहीं है। इस नरेटिव में लोकल ट्रेनें, फुटपाथ और वे दोस्ताना संबंध नहीं हैं। मेहनत, पसीने और सपनों का रूमान नहीं है। बेरोजगारी, तस्करी, जमीनों पर अवैध कब्जे की दुनिया, बिल्डरों से जबरन वसूली, सुपारी हत्या से भरा एक सिनिकल संसार। हिंसा, वहशत, धार्मिक उन्माद, चेहरा विहीन भीड़, संगठित अपराध और शक्ति-तंत्र के साथ संबंधों की एक अजीब सी वैधता। 90 के दशक की ‘सत्या’ और ‘कंपनी’ जैसी फिल्मों में एक ध्वस्त होते आधुनिक शहर का विकराल अंधेरा है। शहर के माफिया जगत के तार अब वैश्विक अपराध जगत से जुड़ गए हैं। हमारे पॉपुलर सिनेमा में एक आधुनिक कहे जाने वाले इस शहर के अर्बन लैंडस्केप का यह जो रूपांतरण है, वह हमारे जटिलताओं और विरोधाभासों से भरे इस समय का एक चार्टर है। सिनेमा और शहर के रिश्तों पर कई महत्वपूर्ण किताबें इस बीच आईं। अमेरिका की वार्विक यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन की प्रोफेसर रश्मि वर्मा अपने एक चर्चित लेख ‘प्रोविन्सि्यलाइजिन्ग द ग्लोबल सिटी : फ्रॉम बॉम्बे टू मुंबई’ में इन पचास वर्षों में हमारे पॉपुलर सिनेमा में उभरी शहर की छवियों को समाज विज्ञान के अकादमिक अध्ययन से जोड़ देती हैं। इन छवियों की भीतरी पर्तों में छिपी हुई बहुत सारी अनसुनी आवाजों को सुना गया है ।

भूमंडलीकरण का राग और संकीर्ण प्रांतवाद ये दोनों बातें एक साथ घटित हुई हैं – और यही हमारी उत्तर आधुनिकता है। आधुनिकता के वे सारे पुराने रुपहले यूटोपिया समाप्त हुए। अब अनुभवों और बोध के छूटे हुए, अवरुद्ध, विच्छिन्न, मूक, कसकते हुए कुछ विकल कोने हैं, जिन्हें कभी कोई अर्थ नहीं मिल पाता। अब हमारे एक ही शहर के भीतर कई शहर हैं। यह बिखराव ही हमारा समय है।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और कुशीनगर में जहरीली शराब से अब तक 80 लोगों की मौत

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और कुशीनगर में जहरीली शराब से अब तक 80 लोगों की मौत हो चुकी है। इतनी जानें एक साथ पिछले 3-4 सालों में शायद ही किसी हादसे में गई होंगी, गईं भी तो किस वजह से जहरीली या अवैध शराब पीने से। आप कहेंगे कि किसने कहा था पीने के लिए, गलती उन्हीं की है। सही बात है, गलती पीने वालों की ही है। लेकिन अगर शराब के नाम पर ‘कीटनाशक’ खुले में बिक रहा है, घर-घर में पकाकर बेचा जा रहा है तो जिम्मेदार कौन है? क्या जिलों के आबकारी विभाग के अधिकारी और पुलिसकर्मी इतने मासूम होते हैं कि उन्हें इस बारे में पता तक नहीं होता है। सबको सब पता होता है और इस जहर के धंधे में सब बराबर के भागीदार होते हैं।



इतनी मौतों की घटना के बाद योगी सरकार ऐक्शन में है। इस बार ऐक्शन में होने का दबाव भी है, क्योंकि बाराबंकी के देवा, हरदोई या लखनऊ की तरह 10-5 मौतें नहीं हुई हैं। 80 लोगों की जान गई है, जो अस्पतालों में भर्ती हैं उनमें से ना जाने कितने अंधे या अपाहिज होकर अस्पताल से लौटेंगे। अब तक 215 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, अभी और गिरफ्तारियां होंगी। जिन 215 लोगों की गिरफ्तारी हुई है, अपराधी सिर्फ इतने ही नहीं हैं इनकी संख्या हजारों में होगी। देखिए कितनी बड़ी मछलियां पकड़ी जाएंगी।

सीधे मुख्यमंत्री की ओर से दबाव पड़ने पर पुलिस और आबकारी के अधिकारी बहुत ऐक्टिव हो गए हैं, मतलब उम्मीद से ज्यादा। सैकड़ों गिरफ्तारियों के साथ हजारों लीटर कच्ची शराब बर्बाद की गई है। हालांकि इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला कि पुलिस को इतनी जल्दी गिरफ्तार करने के लिए 215 लोग कहां से मिल गए? कहां से बर्बाद करने के लिए हजारों लीटर कच्ची शराब और लहन हाथ लग गई? इतनी चुस्ती बाकी दिनों में कहां थी? ये ऐसे सवाल हैं, जो उतना ही ज्यादा सिर उठाएंगे जितनी अच्छी पुलिस कार्रवाई करेगी। क्योंकि गांव-देहात और छोटे शहरों में एक नए-नवेले नशेड़ी को भी पता होता है कि कच्ची शराब शहर या गांव में कहां-कहां और किस-किस घर में मिलती है। पुलिस और आबकारी वालों से कैसे आप इतने मासूम होने की उम्मीद कर सकते हैं। कुछ अधिकारी और पुलिसकर्मी ऐसे भी हैं जो अच्छा काम करते हैं और जिनके नाम भर से अवैध शराब का धंधा करने वाले कांपते हैं, लेकिन ये इतने कम हैं कि ‘उस्तादों’ के आगे की गई इनकी कार्रवाई का कोई मोल नहीं रह जाता।



जहरीली शराब से पहली बार इतनी मौतें नहीं हुई हैं। यूपी का तो भरा-पूरा इतिहास रहा है कच्ची शराब से मौतों का। 2013 में आजमगढ़ में 42 लोग जहरीली शराब की भेंट चढ़े थे, तभी ऐसी कार्रवाई की गई थी। 2015 में राजधानी लखनऊ के मलिहाबाद में जब 38 लोग जहरीली शराब से मरे थे, तब भी ऐसी कार्रवाई हुई थीं। गिरफ्तारी और सस्पेंड वाली परंपरा भी निभाई गई थी, मगर नतीजा क्या हुआ? आज जो अखिलेश यादव बीजेपी सरकार को कोसने की औपचारिकता कर रहे हैं, उन्हें भी भूलना नहीं चाहिए कि आजमगढ़ और लखनऊ में जब इस जहरीली शराब ने दर्जनों जानें ली थीं, तब मुख्यमंत्री वही थे।

अखबार पढ़ते हुए या टीवी पर जहरीली शराब से मौत की खबरें देखते हुए अपना वाइन या विस्की का गिलास हाथ में लेकर कई ‘जेंटलमैन’ सोचते होंगे कि आखिर ये लोग हैं कौन जो कच्ची शराब के शौकीन हैं? ये कच्ची के शौकीन मजदूर, रिक्शा-ठेलिया खींचने वाले, शराब के आदी मगर जेब से खाली लोग होते हैं। अब शौक तो शौक, उसे अमीरी-गरीबी से क्या मतलब। तब तो बिल्कुल नहीं जब खुद प्रदेश सरकार शराब पर बैन की पहल तो दूर बिक्री का समय बढ़ाने और शराब से राजस्व बढ़ाने पर ध्यान लगाए हो। सबको शराब से मतलब है, अमीर अफॉर्ड कर लेता है तो विस्की और वाइन पी लेता है, गरीब नहीं कर पाता तो कच्ची और देसी से काम चलाता है, इसी में कभी-कभार ‘धोखा’ भी हो जाता है। हालांकि राहत की बात है कि खजाने में ‘रेवेन्यू’ यहां से भी बराबर आता है। बस ‘खाते’ में नहीं चढ़ता।

राजनीतिक घटनाएं सामान्य नजर आ रही हैं

जबकि कुंभ मेले में नागा बाबाओं ने हमेशा की तरह पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया है और देशभर के श्रद्धालु वहां पहुंचकर बेहतरीन बंदोबस्त के बीच अपनी धार्मिक आस्थाओं को फलीभूत होते देखने के आनंद में मग्न हैं, इधर बहुत धीरे से चुनावी सरगर्मी बढ़ गई है।

सरसरी तौर पर देखने पर तो तमाम राजनीतिक घटनाएं सामान्य नजर आ रही हैं, लेकिन गहरी नजर डालने पर साफ मालूम पड़ जाता है कि इनके तार आने वाले लोकसभा चुनावों से जुड़े हुए हैं। अव्वल तो नमो और रागा में फिर पुरानी जंग छिड़ चुकी है। लगभग रोज ही दोनों एक दूसरे की ओर सद्भावनाओं से एकदम खाली और दुर्भावनाओं से पूरी तरह भरी हुई मिसाइलें छोड़ रहे हैं। कोलकाता में सीबीआई को लेकर राज्य और केंद्र के बीच जो शक्ति प्रदर्शन हुआ, वह आने वाले दिनों में क्या-क्या रंग दिखा सकता है, लोग भांप चुके हैं। शांति प्रिय नागरिकों के मन में डर अपनी पैठ बना चुका है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वह कोई भी हो, कितना भी बड़ा नेता रहा हो या अभी भी हो, कितना भी बड़ा मंत्री रहा हो या अभी भी हो, अगर गलत काम किया, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। इसीलिए वाड्रा और चिदंबरम को अगर ईडी और सीबीआई के अफसरों की पूछताछ में शामिल होना पड़ रहा है, तो इसमें गलत कुछ नहीं। और अगर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व मंत्रियों या भाजपा के खिलाफ खड़ी पार्टियों मसलन सपा और बसपा के मुलायम, मायावती अखिलेश आदि पर भी सीबीआई शिकंजे कस रही है, तो ऐसा होना ही चाहिए। भारतीय जनता की खून पसीने की कमाई को कोई भी नेता, चाहे वह किसी भी पार्टी का क्यों न हो, अपनी तिजोरी भरने या अपने निजी ऐश्वर्य के लिए इस्तेमाल करता है, तो उसके खिलाफ जांच होनी ही चाहिए और दोषी पाए जाने पर उसे सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन क्या वाकई इस मुल्क में कभी ऐसा होगा?



राजनीति में पदार्पण करनेवाले ज्यादातर लोग सिर्फ सत्ता के बारे में बात करते हैं, सिर्फ सत्ता के बारे में सोचते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जरूर प्रधान सेवक होने की बात की थी, लेकिन वह बात सिर्फ बात ही बन कर रह गई। एक प्रगतिशील राष्ट्र में वैचारिक बहसें चलनी चाहिए, सेवा की नई मिसालें कायम होनी चाहिए, गरीबों और हाशिए पर जी रहे नागरिकों को ऊपर उठाने के तरीकों पर विचार-विमर्श होना चाहिए, पर हमारे देश में यही सब नहीं हो रहा। शिक्षा के मामले में दुनिया एक से बढ़कर एक नामी विश्वविद्यालयों से पटी हुई है, पर हमारे संस्थानों का आज भी कहीं कोई स्थान नहीं, इस स्थिति पर कोई बातचीत नहीं हो रही। इसके बारे में क्या कहा जाए कि हमारे पास तीस करोड़ से ज्यादा उपभोक्ताओं का मध्यवर्ग है, फिर भी अर्थव्यवस्था और रोजगार पैदा करने के मामले में हम कोई कमाल नहीं कर पा रहे। रोजगार पर कोई चर्चा ही नहीं हुई और जब हुई तो इसलिए कि सरकार बेराजगारी बढ़ने के आंकड़े दबाए बैठी थी।


उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में कांग्रेस

उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में कांग्रेस जिस तेवर के साथ उतरी है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। प्रियंका गांधी को आगे कर पार्टी नए सिरे से अपनी जमीन तलाश रही है। उसका यह आत्मविश्वास तीन राज्यों की जीत से आया है। वैसे 2009 के लोकसभा चुनाव में वह एसपी-बीएसपी की बराबरी पर भी आ चुकी है। हालांकि तब कल्याण सिंह को लाल टोपी पहनाने के कारण मुस्लिम मुलायम सिंह से नाराज थे और उन्होंने कांग्रेस का समर्थन कर दिया था। पर आज की स्थिति अलग है। बीजेपी से सीधे मुकाबले में कांग्रेस को कामयाबी वहीं मिलती है जहां सीधा मुकाबला हो और दूसरे वोट बैंक भी ठीक-ठाक हों। यूपी में कांग्रेस का बीजेपी से न तो सीधा मुकाबला होने वाला है, न ही उसका वोट बैंक बचा है।

आजमाया हुआ दांव


झंडे साथ आ गए हैं, वोट भी साथ आ जाएं तो बनेगी बात

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद जो भी चुनाव हुए हैं उनमें कांग्रेस समाजवादी पार्टी (एसपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से नीचे ही रही है। आज भी बीजेपी के वोट के मुकाबले एसपी और बीएसपी का साझा वोट बैंक ही है, किसी दूसरे का नहीं। फूलपुर, गोरखपुर और कैराना के उपचुनाव इसकी पुष्टि करते हैं। दरअसल आज भी इन दोनों दलों के पास दलित, पिछड़ा और मुस्लिम का बड़ा वोट बैंक है। यही वजह है कि बीजेपी के सामने यूपी में असल चुनौती एसपी-बीएसपी गठबंधन नजर आ रहा है। बीते सोमवार को कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी के रोड शो में जुटी भीड़ से बहुत लोग मानने लगे कि कांग्रेस राज्य में बड़ी ताकत बनने जा रही है। पर हालात कुछ अलग दिखते हैं। सिर्फ चेहरा और भीड़ के आधार पर वोट का समीकरण नहीं बन पाता। पिछले डेढ़ दशक में यूपी की राजनीति मुख्य रूप से एसपी-बीएसपी के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रही है। पहली बार एसपी-बीएसपी साथ आईं तो बीजेपी सत्ता की राजनीति में काफी पिछड़ गई। नारा लगा, ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय…’। यह प्रयोग कई वजहों से नाकाम हुआ पर प्रदेश की राजनीति पर दोनों पार्टियों का दबदबा तमिलनाडु के डीएमके-एआईडीएमके की तर्ज पर बना रहा। एक जाता तो दूसरा आ जाता। यह सिलसिला नरेंद्र मोदी के आने तक चलता रहा।

मोदी के आने के बाद लोकसभा में बीएसपी का सूपड़ा साफ हो गया तो एसपी और कांग्रेस का सिर्फ परिवार ही बचा। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और एसपी एक साथ आईं पर राहुल और अखिलेश मिलकर भी बीजेपी की आंधी को नहीं रोक पाए। बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला। यह उस राजनीतिक प्रचार का असर था कि एसपी राज में सिर्फ मुस्लिम-यादव की चलती है जबकि बीएसपी राज में दलित-मुस्लिम की। इन दोनों दलों पर जातीय भेदभाव का आरोप चस्पा हो गया। वैसे मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में कहा जाता है कि वे चार साल ग्यारह महीने राजपूत रहते हैं और चुनाव वाले महीने में हिंदू हो जाते हैं। पर हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी राज्य में भारी बहुमत से जीत कर आई। साथ ही उसने पिछड़ों को भी साधा। छोटे-छोटे दलों से समझौता कर अपना वोट बैंक बढ़ाया, जबकि एसपी और बीएसपी के वोट बैंक का कोई विस्तार नहीं हुआ। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ लड़कर बुरी तरह हार गईं। इस हार के साथ यह भी तय हो गया कि मोदी वाली बीजेपी का मुकाबला दोनों दल अकेले नहीं कर सकते हैं।

फूलपुर और गोरखपुर के उप चुनाव ने दोनों पार्टियों के गठबंधन की नींव तैयार की। बाद में केंद्र ने जिस तरह सीबीआई का राजनीतिक इस्तेमाल क्षेत्रीय दलों को तोड़ने-फोड़ने के लिए किया, उससे इस गठबंधन को और मजबूती मिली। एसपी-बीएसपी गठबंधन में कांग्रेस भी आ सकती थी, लेकिन छत्तीसगढ़ ,राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने बीएसपी के साथ जो व्यवहार किया, उसका असर यूपी पर भी पड़ा। बीएसपी के चलते एसपी ने भी हाथ खींच लिए वर्ना मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ उसका समझौता हो सकता था। दूसरे, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर दिया है। ऐसे में बीएसपी के साथ-साथ एसपी का भी दूर छिटक जाना लाजमी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस एसपी-बीएसपी के मुस्लिम वोट बैंक में कुछ सीटों पर भले ही सेंध लगा ले, पर ज्यादातर सीटों पर वह बीजेपी के अगड़े वोट बैंक में ही कतर-ब्योंत करेगी। दलित-पिछड़ा वोट बैंक पर कांग्रेस की अभी इतनी पकड़ नहीं है कि वह एसपी-बीएसपी गठबंधन को ज्यादा नुकसान पहुंचा सके। बल्कि अलग लड़कर वह इस गठबंधन को फायदा ही पहुंचाएगी। ठीक उसी तरह जैसे एक दौर में वीपी सिंह ने अनिल अंबानी के दादरी प्रॉजेक्ट को लेकर मुलायम सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ा था। वामपंथी समेत बहुत से छोटे-छोटे दल वीपी सिंह के जनमोर्चा गठबंधन में शामिल हुए थे। वीपी और राज बब्बर की सभाओं में भीड़ भी जुटती। इससे मुलायम सिंह सरकार के खिलाफ माहौल बना और वे सत्ता से बाहर हो गए। पर जनमोर्चा गठबंधन को इसका कोई फायदा नहीं मिला। फायदा हुआ मायावती की बीएसपी को, जिसका इस आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था।


कुछ लोग प्रियंका में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देखते है। वजह है कमोबेश वैसा ही चेहरा-मोहरा और वही आक्रामक स्वभाव।

इंदिरा की छवि

प्रियंका गांधी का आना फिर पुराने दिनों की याद दिलाता है। उनका यूपी के लोगों पर एक अलग असर रहा है। कुछ लोग प्रियंका में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देखते है। वजह है कमोबेश वैसा ही चेहरा-मोहरा और वही आक्रामक स्वभाव। इंदिरा-नेहरू परिवार का राज्य में गहरा असर रहा है। आज भी हर गांव में कोई न कोई पुराना कांग्रेसी जरूर मिल जाएगा। पर वोट की राजनीति में कांग्रेस का ढांचा बहुत कमजोर है। प्रियंका गांधी मध्यवर्ग को लुभाएंगी इसमें कोई शक नहीं, पर लोकसभा चुनाव में वे कितनी कामयाब होंगी, देखने की बात है।


बेमियादी धरने पर बैठे

नोएडा अथॉरिटी के सेक्टर-6 स्थित कार्यालय पर मंगलवार को सैकड़ों किसानों ने प्रदर्शन किया। इस वजह से पूरे दिन लोग उद्योग मार्ग और आसपास की सड़कों पर ट्रैफिक जाम से जूझते रहे। इसका असर यूपी बोर्ड की परीक्षा देने जा रहे विद्यार्थियों पर भी पड़ा। वे परीक्षा केंद्रों पर देरी से पहुंचे। उधर, मुख्य रास्ता बंद होने से लोगों को अथॉरिटी ऑफिस तक पहुंचने और पार्किंग के लिए जगह ढूंढने में दिक्कत हुई। किसान यहां बेमियादी धरने पर बैठ गए हैं। इससे लोगों की परेशानी आगे भी बने रहने के आसार हैं। पहले दिन के प्रदर्शन के दौरान किसानों ने अपने मुद्दे उठाए लेकिन अथॉरिटी की ओर बातचीत का कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया न ही इसके लिए पहल की गई है।

सुबह 11 बजे से किसानों ने यहां प्रदर्शन शुरू कर दिया। ढोल, नगाड़े के साथ शाम तक यह जारी रहा। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल हुए। इस वजह से उद्योग मार्ग पर लंबा जाम लग गया। पेटीएम बिल्डिंग के सामने से लेकर नोएडा अथॉरिटी के गेट तक लोग ही लोग नजर आए। वहीं, चारों ओर पुलिस का पहरा भी रहा। इस दौरान 10-20 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से वाहन चले। शाम 4 बजे किसानों ने सेक्टर-6 में रैली निकाली। इस दौरान भी जाम के हालात बने रहे।

बेमियादी धरने पर बैठे

किसानों का नेतृत्व कर रहे सुखवीर पहलवान ने बताया कि वे बेमियादी धरने पर बैठ गए हैं। मांगे पूरी होने के बाद ही यहां से उठेंगे। रात भर किसान यहीं रुकेंगे और बुधवार दोपहर फिर प्रदर्शन होगा। अथॉरिटी के अधिकारी आएं और हमारी बात सुनें। वहीं, अथॉरिटी के ओएसडी राजेश सिंह ने कहा कि किसानों से बाचतीच का अभी अथॉरिटी की ओर से प्रयास नहीं किया गया है।

आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा

केन्द्र सरकार ने सोमवार को कैबिनेट बैठक में बड़ा फैसला लेते हुए आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है।  सरकार ये आरक्षण उन सवर्णों को देगी जिनकी सालाना आय आठ लाख रुपये से कम है। इसके लिए संविधान में संशोधन के लिए संसद के चालू सत्र में बिल लाया जाएगा। आपको बता दें कि मौजूदा कानून में 49.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।


प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, इसके लिए संविधान में संशोधन के लिए संसद के चालू सत्र में बिल लाया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन  सरकार संसद में बिल ला सकती है।

सरकार की ओर से यह फैसला तब आया है जब लोकसभा चुनाव होने में महज कुछ ही महीनों का समय बचा है। इससे पहले दलित नेता और मंत्री रामदास अठावले ने पहले सवर्ण जातियों के लिए आरक्षण देने की वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि सवर्ण जातियों को 25 फीसदी आरक्षण दिया जाना चाहिए।यह मौजूदा 50 प्रतिशत आरक्षण से अलग होगा। एक सूत्र ने बताया, 'आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा जिन्हें अभी आरक्षण का फायदा नहीं मिल रहा है।'कैबिनेट के सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने के फैसले से पहले अनुसूचित जाति  को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति  को 7.5 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।


सूत्रों ने कहा कि सामान्य वर्ग को अभी आरक्षण हासिल नहीं है। एक सूत्र ने बताया, ''आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा जिन्हें अभी आरक्षण का फायदा नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आरक्षण का लाभ उन्हें मिलने की उम्मीद है जिनकी वार्षिक आय आठ लाख रूपये से कम होगी और पांच एकड़ तक जमीन होगी। सूत्रों ने बताया कि फैसले को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन करना होगा। आपको बता दें कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में अनुसूचित जाति (SC) को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति (ST)  को 7.5 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।


आपको बता दें कि आरक्षण की शुरुआत आजादी के पहले प्रसिडेंसी और रियासतों में पिछड़े  वर्गों के लिए शुरू हुई थी। 1901 में महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने गरीबी दूर करने के लिए पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की शुरुआत की थी। इसके बाद अंग्रेजों ने 1908 में आरक्षण शुरू किया था। मद्रास प्रेसिडेंसी ने 1921 में 44 फीसदी गैर-ब्राह्मण, 16-16 फीसदी ब्राह्मण, मुसलमान और भारतीय-एंग्लो/ईसाई को और अनुसूचित जातियों को लोगों को 8 फीसदी आरक्षण दिया गया था।

इसके बाद 1935 में भारत सरकार अधिनियम के तहत लोगों को सरकारी आरक्षण सुनिश्चित किया था। बाबा साहब अम्बेडकर ने 1942 में सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग उठाई थी।

क्या है आरक्षण का उद्देश्य
आरक्षण देने का उद्देश्य केंद्र और राज्य में शिक्षा के क्षेत्र, सरकारी नौकरियों, चुनाव और कल्याणकारी योजनाओं में हर वर्ग की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए की गई। जिससे समाज के हर वर्ग को आगे आने का मौका मिले।

वहीं आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, 'आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्ण जातियों के लिये मोदी सरकार ने 10% आरक्षण का स्वागत योग्य चुनावी जुमला छोड़ दिया है, ऐसे कई फैसले राज्यों ने समय-समय पर लिये लेकिन 50% से अधिक आरक्षण पर कोर्ट ने रोक लगा दी क्या ये फैसला भी कोर्ट से रोक लगवाने के लिये एक नौटंकी है'। इसके बाद एक अन्य ट्विट में संजय सिंह ने लिखा-10% आरक्षण बढ़ाने के लिये संविधान संशोधन करना होगा सरकार विशेष सत्र बुलाये, हम सरकार का साथ देंगे वरना ये फैसला चुनावी जुमला मात्र साबित होगा। इस ट्विट को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी रिट्वीट किया है।

वहीं नेशनल कांन्फ्रेंस के नेता उमर अबदुल्ला ने कहा है कि गरीब सवर्णों को आरक्षण का ऐलान साबित करता है कि चुनाव का बिगुल अच्छे से बजाया जा चुका है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले ने उच्च जातियों के बीच आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कदम का स्वागत किया है।

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10% आरक्षण देने का प्रस्ताव एक जुमले से ज्यादा कुछ नहीं है। यह कानूनी पेचीदगियों से भरा हुआ है और संसद के दोनों सदनों से इसे पारित करने का कोई समय नहीं है। सरकार पूरी तरह से बेनकाब है।



सवर्णों के लिए क्यों जरूरी है आरक्षण, जानिए वे पांच कारण

1- सवर्णों में भी हैं गरीब
यह आम धारणा है कि सवर्ण का मतलब होता है समर्थ लेकिन यह सही नहीं है। सवर्णों में भी आर्थिक रूप से कमजोर लोग हैं। यह आंकड़ों से भी साबित हो चुका है। इसके मद्देनजर आरक्षण उनकी जायज मांग है।

2- खेती की खराब हालत
पिछले कुछ सालों से कृषि क्षेत्र और किसानों की हालत खराब हुई है। फसल उगाने के लिए पहले से ज्यादा निवेश करना पड़ रहा है जबकि उससे बहुत अच्छा रिटर्न नहीं मिल रहा है। इससे न सिर्फ सवर्ण बल्कि अन्य जातियां भी प्रभावित हुई हैं लेकिन आरक्षण के कारण अन्य जातियों को इससे बचने में मदद मिली है जबकि आर्थिक रूप से सवर्ण के पास कोई चारा नहीं है।

- शहरों में रोजगार में कमी
शहरी इलाकों में रोजगार के घटते अवसरों के कारण भी लोगों में असंतोष है। खासकर निजी क्षेत्र में पहले कम नौकरियां हैं। जहां तक सार्वजनिक क्षेत्र की बात है तो वहां आरक्षण के कारण सवर्णों के लिए बहुत कम मौके हैं।

4- आरक्षण का फायदा
आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के महसूस हो रहा है कि बिना आरक्षण के उनका कल्याण संभव नहीं है क्योंकि अपनी आंखों के सामने देख रहे हैं कि कैसे एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के लोग आरक्षण का फायदा उठाकर आगे बढ़ रहे हैं। न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हुई है बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी वे मजबूत हुए हैं।

राजनीतिक समर्थन
सवर्णों को आरक्षण की मांग बहुत पुरानी है। इसे राजनीतिक समर्थन भी प्राप्त है। दरअसल, कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसी नहीं है जो इसका विरोध करने का साहस कर सके। यहां तक कि बसपा जैसी पार्टी भी सवर्णों के लिए आरक्षण की वकालत कर चुकी है।

मनुष्य को केवल इस रूप में स्वीकार करते हैं भगवान

एक बार भयानक सूखा पड़ा। सारे फसल नष्ट हो गये और जमीन बंजर हो गई। किसानों ने हार मान ली और बीजों को ना बोने का फैसला लिया। फसल बुवाई का यह चौथा साल था जब बारिश नहीं हुई थी। किसान उदास होकर बैठ गये। वो ताश खेलकर या कोई और काम कर अपना समय बिताने लगे। हालांकि एक किसान था जिसने धैर्य के साथ बीजों को बोया और अपने जमीन की देखभाल भी करता रहा। दूसरे किसान रोजाना यह कहकर उसका मजाक उड़ाते थे कि वह निर्रथक ही अपनी फलरहित और बंजर जमीन की देखभाल कर रहा है। जब वो उनसे उसकी इस बेवकूफी भरी दृढ़ता का कारण पूछते तो वह कहता, “मैं एक किसान हूं और अपनी जमीन की देखभाल करना और उसमें बीज बोना मेरा धर्म है। बारिश हो या ना हो, इससे मेरा धर्म नहीं बदलता। मेरा धर्म मेरा धर्म है और मैं अवश्य ही इसका पालन करुंगा, भले ही इसका फल मुझे मिले या ना मिले।”

दूसरे किसान उसके इस बेकार के प्रयास पर हंसने लगे। फिर वो अपनी बंजर जमीन और बारिश रहित आसमान का विलाप कर अपने-अपने घर चले गये। हालांकि जब वह किसान विश्वास के साथ अपना जवाब दे रहा था, तभी एक बादल वहां से गुजर रहा था।

बादल ने किसान के सुंदर शब्दों को सुना और महसूस किया, “वह सही है।” जमीन की देखभाल करना और बीजों को रोपणा उसका धर्म है और अपने में संग्रहित पानी को धरती पर बरसाना मेरा धर्म है।” उसी पल, किसान के संदेश से प्रेरित होकर बादल ने खुद में जमा सारे पानी को बारिश के रूप में किसान की भूमि के उपर छोड़ दिया। इस बादल ने धर्म का यह संदेश दूसरे बादलों तक पहुंचाना भी जारी रखा और जिस कारण वो भी बारिश कर अपना-अपना धर्म निभाने लगे। जल्द ही सारे बादल जमीन पर बारिश करने लगे और इससे किसान की खेती भरपूर रूप से हुई।

मनुष्य को केवल इस रूप में स्वीकार करते हैं भगवान

परमहंस आश्रम में एक संत जोश-जोश में अधिक भावुक हो गया। सामूहिक रूप से हो रहे जाप के मध्य में वो रोने लगा और भगवान का नाम लेकर जमीन पर लोटने लगा। कुछ संतो को ऐसा करना पसंद ना आया। लेकिन जब इसके बारे में योगानंद को बताया गया तो उन्होंने कहा, “आह – काश कि आप सबों में उस तरह का उत्साह भरा होता!” हमें यह समझने की आवश्यकता है कि भगवान के लिए क्या जरूरी है। हमें शायद पता है कि आध्यात्मिक जीवन किस चीज के बारे में है। लेकिन भगवान हमारे सोच की परवाह नहीं करते हैं। और ना ही वो हमारी भावनाओं और छवि की परवाह करते हैं जो हमने खुद के सामने और दुनिया के सामने बनाई है।

भगवान हमें बिल्कुल वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे हम वाकई में हैं। और हम जिस भी रूप में है, उसे हमने अपनी चेतना से जन्म दिया है। हमारी चेतना हमारे जीवन के कर्मों, विचारों, और सभी जरूरी भावनाओं को आकार प्रदान करती है।19वीं सदी के एक महान बंगाली संत, श्री रामकृष्ण के एक शिष्य एक बार आश्रम में नृतकों, गायकों और कलाकारों के एक समूह को लेकर आये। मनोरंजन करने वाले निम्न जाति के थे, लेकिन रामकृष्ण ने उन्हें गले से लगा लिया और उनके प्रति अपना प्रेम व्यक्त किया।

उनलोगों के जाने के बाद कुछ संकीर्ण सोच वाले उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि आपने ऐसे छोटे वर्ग वाले लोगों का स्वागत क्यों किया? तो उस महान योगी ने कहा, “अब जिस भगवान की वो लोग पूजा करते हैं, वो नृत्य और संगीत है।” उन्होंने आनंदित होकर कहा, “आह – लेकिन वो जानते हैं कि अपने भगवान की पूजा कैसे करनी है।” और इसी से भगवान प्रसन्न होते हैं। यह हमारी तरह खुद को दुनिया के समाने सावधानी से या सुनियोजित रूप से प्रस्तुत नहीं करते हैं।


मृत्यु का अर्थ है भौतिक शरीर से आत्मा का जुदा होना है। मृत्यु नये और बेहतर जीवन का एक प्रारंभिक बिन्दु बन जाता है। यह जीवन के उच्च रूप का द्वार खोलता है। यह संपूर्ण जीवन का केवल एक प्रवेशद्वार है। जन्म और मृत्यु माया के मायाजाल हैं। जन्म लेते ही मरने की शुरुआत हो जाती है और मरते ही जीवन की शुरुआत हो जाती है। जन्म और मृत्यु इस संसार के मंच पर प्रवेश करने और बाहर जाने का द्वार मात्र है। वास्तव में ना तो कोई आता है और ना ही कोई जाता है। केवल ब्रह्म और अनंत का ही अस्तित्व होता है। जैसे आप घर से दूसरे घर में जाते हैं, वैसे ही आत्मा अनुभव प्राप्त करने के लिए एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। जैसे मनुष्य़ पुराने कपड़े छोड़कर नए कपड़े पहनता है, बिलकुल वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। मृत्यु जीवन का अंत नहीं है। जीवन एक कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है। यह निरंतर चलती ही रहती है। मृत्यु एक जरूरी घटना है जिसका अनुभव हर आत्मा को भविष्य में विकास करने के लिए करना है। एक विवेकी और बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी मौत से नहीं डरता है।

हर आत्मा एक चक्र है।

इस चक्र की परिधि कहीं भी खत्म नहीं होती लेकिन इसका केन्द्र हमारा शरीर है। तो फिर, मौत से क्यों डरना चाहिए? परमात्मा या सर्वोच्च आत्मा मृत्युरहित, कालातीत, निराधार और असीम है। यह शरीर, मन और पूरे संसार के लिए एक केन्द्र है। मृत्यु केवल भौतिक शरीर को प्राप्त होती है, जो पांच तत्वों से बना है। मृत्यु शाश्वत आत्मा को कैसे मार सकती है जो समय, स्थान और कर्म से परे है? अगर आप जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाना चाहते हैं तो आपको शरीरविहीन होना होगा। शरीर हमारे कर्मों का परिणाम है। आपको कोई भी कार्य फल की उम्मीद किए बिना ही करना चाहिए। अगर आप खुद को रागद्वेष या पसंद और नापसंद से मुक्त कर लेते हैं, तो आप खुद को कर्म से भी मुक्त कर लेंगे। आप केवल अहंकार को ही खत्म कर खुद को ‘राग’ और ‘द्वेष’ से मुक्त कर सकते हैं। जब अविनाशी ज्ञान के द्वारा अज्ञानता का अंत हो सकता है तो आप अहंकार का भी विनाश कर सकते हैं। इसलिये इस शरीर के जड़ का कारण यह अज्ञानता है। जिसने भी उस अमर आत्मा का एहसास कर लिया जो सभी ध्वनि, दृश्य, स्वाद और स्पर्श से परे है, जो निराकार और निर्गुण है, जो प्रक़ृति से परे है, जो तीन शरीर और पांच तत्वों से परे है, जो अनंत और अपरिवर्तनीय है, उसने खुद को मौत के मुंह से आजाद कर लिया।

जीव या व्यक्तिगत आत्मा अपने कार्यों को प्रदर्शित करने के लिए और अनुभव प्राप्त करने के लिए अनेक शरीर धारण करती है। वो शरीर में प्रवेश करती है और फिर जब वह शरीर जीने लायक नहीं रहता, तो उसे त्याग देती है। वह फिर से एक नए शरीर का निर्माण करती और पुन: वही प्रक्रिया दोहराती है। यह प्रक्रिया स्थानांतरगमन कहलाती है। किसे नये शरीर में आत्मा का प्रवेश करना जन्म कहलाता है। शरीर से आत्मा का अलग हो जाना मृत्यु कहलाता है। अगर शरीर में आत्मा न हो तो वह शरीर मृत शरीर है और इसे प्राकृतिक मृत्यु कहते हैं। एककोशकीय जीवों के लिए प्राकृतिक मृत्यु अज्ञात है। जब पृथ्वी पर ऐसे जीवों को जीवन मिलता है तो उनकी मृत्यु अज्ञात होती है। यह घटना केवल बहुकोशकीय जीवों के साथ ही होती है। प्रयोगशालाओं के शोधों से पता चला है कि किसी के जीवन की समाप्ति के बाद भी उसके अंग काम कर सकते हैं। मृत्यु के बाद भी कई महीनों तक सफेद रक्तकण शरीर में जीवित रहते हैं। मृत्यु जीवन का अंत नहीं है। यह महज एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व की समाप्ति है। जीवन संसार पर विजय पाने के लिए चलती रहती है। यह तब तक चलती रहती है जबतक यह अनंत में विलीन नहीं हो जाती।

जीवन संत गाडगे जी महाराज जैसा होना चाहिए: लोकेश चौधरी

   गाजियाबाद: महानगर कांग्रेस कमेटी कार्यालय कंपनी बाग पर संत गाडगे जी महाराज की जयंती पर चित्र पर पुष्प अर्पित कर विचार गोष्ठी की गई जिसमें...