Sunday, 29 December 2019

एनआरसी और सी ए ए पर इंटरनेट की भूमिका

 साभार varishth TV patrakaar रवीश कुमार

क्या दुनिया की कोई पुलिस है जो भारत की पुलिस को बता सके कि इंटरनेट चालू होते हुए कानून व्यवस्था कैसे संभाली जा सकती है? जिस तरह से बात-बात में भारत में इंटरनेट बंद होने लगा है उससे लगता है कि हमारी पुलिस को सारा काम तो आता है, लेकिन जब इंटरनेट चलता है तो वह कानून व्यवस्था नहीं संभाल पाती है. आईटी सेल खुलेआम गालियां से लेकर धमकियां लिखते रहते हैं, पुलिस को उनसे ख़तरा नहीं होता है. लेकिन ऐसा क्यों होता है कि वैसे पोस्ट वाले ही ज़्यादातर गिरफ्तार होते हैं जो सरकार पर सवाल या कटाक्ष करते हैं?

हांगकांग में 15 मार्च से प्रदर्शन चल रहे हैं मगर वहां पर इंटरनेट बंद नहीं हुआ है. वहां कारण यह था कि इंटरनेट बंद हुआ तो भारी आर्थिक नुकसान होगा. कश्मीर में नेट बंद होने से ही 10,000 करोड़ के नुकसान का अनुमान है फिर भी इंटरनेट बंद हुआ. यही नहीं हांगकांग का प्रदर्शन लंबा चला, पुलिस से टकराव हुआ, हिंसा भी हुई लेकिन सिर्फ दो ही लोगों की मौत हुई. यूपी में एक हफ्ते के भी 19 लोगों की मौत हो गई है. कहीं संख्या 21 भी बताई जा रही है.

लद्दाख नामक नए केंद शासित प्रदेश के करगिल में 145 दिनों के बाद इंटरनेट शुरू हो गया है. इतने ही दिनों से जम्मू कश्मीर में भी इंटरनेट बंद है. साढ़े चार महीने से सुप्रीम कोर्ट में इंटरनेट बहाल करने की याचिका है. अभी तक फैसले का ही इंतज़ार है. कश्मीर टाइम्स की अनुराधा भसीन ने याचिका दायर की थी. दुनिया में जहां कहीं भी लोकतंत्र नामक चीज़ है वहां पर 145 दिनों तक इंटरनेट बंद नहीं रहा है. अब यूपी को भी इंटरनेट बंदी की आदत होते जा रही है. क्या कोई पुलिस की गालियां बंद करा सकता है? कई वीडियो में पुलिस सांप्रदायिक गालियां भी देती हुई सुनी जा सकती है. दिल्ली के टीवी स्टुडियो थीम और थ्योरी की बहस में चले गए हैं, जबकि ग्राउंड पर अब भी कहानियां आप तक पहुंचने के लिए सिसक रही हैं. 18 साल के आमिर हंज़ला को उसके पिता टीवी के डिबेट से लेकर पटना की गलियों में ढूंढ रहे हैं.

21 दिसंबर को पटना के फुलवारीशरीफ में सामने ये भीड़ आ गई और नागरिकता कानून का विरोध कर रहे लोगों पर पत्थर मारने लगी. इसी तरफ से सामने खड़े प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलती हैं और 11 लोग घायल हो जाते हैं. पुलिस ने बेशक 40 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें गुड्डू चौहान और नागेश सम्राट पर कथित रूप से गोली चलाने के आरोप हैं. इसी गोलीबारी में आमिर ग़ायब हो गया. उसके पिता 21 तारीख से ढूंढ रहे हैं मगर आमिर का पता नहीं चल रहा है. हारुन नगर के साहौल अहमद ने आमिर हंज़ला के पिता ने एफआईआर कराई है मगर अभी तक पता नहीं चला है.

पटना के सोहैल हामिद अपने 18 साल के बेटे को 21 दिसंबर से ढूंढ रहे हैं. बनारस की सवा साल की चंपक 19 दिसंबर से अपनी मां एकता शेखर और पिता रवि शेखर को ढूंढ रही है. बनारस की चंपक के मां और पिता जेल में हैं, क्योंकि वे नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हुई रैली में हिस्सा लेने गए थे. हमारे सहयोगी अजय सिंह ने बताया कि जो 56 लोग गिरफ्तार हुए हैं, उन्हें पहले मजिस्ट्रेट के यहां ज़मानत की अर्जी दी लेकिन वहां खारिज हो गई. जब सेशन कोर्ट गए तो पुलिस केस डायरी नहीं दे सकी. इसलिए ज़मानत पर फैसला नहीं हो सका और 1 जनवरी की तारीख लग गई. इस तरह से सवा साल की चंपक को अपनी मां से और पिता से 5 दिन और दूर रहना होगा. 1 जनवरी को ज़मानत नहीं मिली तो चंपक का इंतज़ार लंबा हो सकता है. 19 दिसंबर से एकता शेखर और रवि शेखर जेल में बंद हैं. ज़ाहिर है अपने मां बाप को पास में न देखकर चंपक के दिलो दिमाग़ पर भी असर पड़ता होगा. अजय सिंह ने बनारस के एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक से बात की.

आपने खबर सुनी होगी कि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के 51 प्रोफेसरों ने नागरिकता संशोधन कानून का विरोध किया और छात्रों से भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए अपील की. उस पत्र पर सबके दस्तखत हैं, लेकिन ख़ौफ इतना ज़्यादा हो गया है कि प्रोफेसर स्तर के शिक्षक भी मीडिया से बात नहीं कर पा रहे हैं. वे फोन उठा तो रहे हैं, लेकिन बोल नहीं रहे हैं. यही नहीं जिस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हुए ज़िंदगी गुज़री है वहां उनके नाम के आगे गद्दार लिख दिया गया है.

कुछ दिन पहले मैं यूनिवर्सटी ऑफ कोलंबिया बर्कली गया था. अमरीका की नामी यूनिवर्सिटी है. यहां पर मैंने जो देखा वो आज के भारत की यूनिवर्सिटी में आप कल्पना नहीं कर सकते हैं. यहां प्रोफेसर के कमरे के बाहर नोटिस बोर्ड पर नारंगी रंग का यह छोटा सा पोस्टर भी प्रोफेसर को जेल भेजने के लिए काफी था. लेकिन यहां आराम से लगा है. किसी ने हटाया नहीं. इस पर लिखा है कि हम मांग करते हैं कि ट्रंप कुसी छोड़ें. मानवता के नाम पर हम इस फासीवादी अमरीका का विरोध करते हैं.

अच्छी बात है कि अब प्रोफसरों की बिरादरी को भी फर्क नहीं पड़ता कि उनके सहयोगियों को गद्दार कहा जाता है. वाइस चांसलर को यह बात बुरी नहीं लगती है ये सबसे अच्छी बात है. उधर एनआरसी और डिटेंशन सेंटर को लेकर कांग्रेस और बीजेपी एक दूसरे की पोल खोलने में बहुत मेहनत कर रहे हैं. इज़ इक्वल टू की मेरी थ्योरी को सही साबित करने की प्रतियोगिता के बीच हम आपको हम राष्ट्रपति का अभिभाषण सुनाना चाहते हैं. 20 जून 2019 को संसद के संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में कहा था कि मेरी सरकार ने यह तय किया है कि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न की प्रक्रिया को प्राथमिकता के आधार पर अमल में लाया जाएगा, जबकि 20 दिसंबर को रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री ने कहा कि मेरी सरकार ने एनआरसी पर कभी चर्चा ही नहीं की.

कैमरे को भी जैसे पता है कि जब राष्ट्रपति एनआरसी ज़िक्र करेंगे तो किन्हें क्लोज़अप में रखना है यानि किन्हें दिखाना है. गृहमंत्री अमित शाह ताली बजाते हुए देखे जा सकते हैं. यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि राष्ट्रपति ने जिस मेरी सरकार का ज़िक्र किया वो प्रधानमंत्री मोदी की ही सरकार थी. आखिर जब सरकार ने चर्चा ही नहीं कि तब राष्ट्रपति के अभिभाषण का हिस्सा कैसे बन गया? आज दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में मार्च निकला.

ज़ोर बाग में भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद की रिहाई के लिए लोगों ने हाथ बांध कर मार्च किया, ताकि उन्हें किसी हिंसा के आरोप में गिरफ्तार न किया जा सके. यह मार्च पीएम के निवास तक जाना चाहता था मगर नहीं जाने दिया गया. इसके अलावा यूपी भवन के सामने भी जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी ने प्रदर्शन का आह्वान किया था. जो सबसे पहले और अकेले लड़की आई उसे भी डिटेन कर लिया गया. यहा धारा 144 लगी थी. ये लोग यूपी भवन को इसलिए घेर रहे थे क्योंकि इनके अनुसार यूपी में सैंकड़ों लोगों को गलत मुकदमों में फंसाया गया है. पुलिस प्रदर्शनकारियों पर हिंसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है. दिल्ली पुलिस ने 400 लोगों को पकड़ा मगर सबको बाद में छोड़ दिया.

जामिया की सृजन चावला भी वहां पहुंच गई यह सुनकर कि उसकी यूनिवर्सिटी के छात्रों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है. सृजन चावला ने मौके से अपना बयान भेजा था हम आपको दिखाना चाहते हैं. जामिया के बाहर प्रदर्शनों का सिलसिला थमा नहीं है. जामिया के पास शाहीन बाग में भी महिलाओं का रात भर प्रदर्शन होता है. छात्र और शिक्षक तरह तरह से प्रदर्शन कर रहे हैं. 12 दिसंबर से ही यहां पर प्रदर्शन हो रहे हैं. शरद शर्मा ने वहां से रिपोर्ट भेजी है.

दूसरी तरफ यूपी आज शांत रहा. कई ज़िलों में इंटरनेट बंद था. कई जगहों पर पुलिस ने फ्लैग मार्च किया. यूपी सरकार की एक प्रेस रिलीज जारी हुई है, जिसमें लिखा है कि बुलंदशहर में मुस्लिम समुदाय ने हिंसा नमाज़ के बाद हुई हिंसा पर अफसोस जताया है और हर्जाने के तौर पर पुलिस को 6 लाख 27 हज़ार, 507 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट और पुष्प सौंपे हैं. 510 भी नहीं, 507 रुपये. कितना सही हिसाब है. इसी प्रेस रिलीज में लिखा है कि मुज़फ्फरनगर में मौलानाओं ने हिंसा के लिए माफी मांगी है. हमने अपने सहयोगी आलोक से पूछा कि एक हफ्ते में यूपी कितना बदल गया है.

वहीं, बीजेपी नागरिकता समर्थन कानून के पक्ष में बड़े अभियान की तैयारी कर रही है, जिसमें लोगों को प्रेरित किया जाएगा कि एक करोड़ लोग कानून के समर्थन में प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे. यह अभियान 5 जनवरी से शुरू होकर 15 जनवरी तक चलेगा. बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह और कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और दूसरे वरिष्ठ नेता अभियान में हिस्सा लेंगे. नागरिकता कानून के समर्थन में बीजेपी की कई जगहों पर सभाएं हो भी रही हैं. असम में मुख्यमंत्री सोनेवाल ने पहली बार समर्थन में रैली की और बड़ी सभा हुई. मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में भी नागरिकता कानून के समर्थन में सभा हुई.

इस मंच पर आप सावरकर का बड़ा सा पोस्टर देख सकते हैं. सावरकर के साथ ज्योतिबा फुले और साहू जी महाराज के साथ बीच में भारत माता की भी तस्वीर है. मंच का नाम संविधान सम्मान मंच रखा गया है. संसद में जब कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा कि सावरकर ने ही नागपुर में सबसे पहले धर्म के आधार पर दो राष्ट्र के सिद्धात की बात की थी. इसके जवाब में अमित शाह ने यही कहा था कि सावरकर ने ऐसा कहा था या नहीं उसकी जानकारी नहीं है और वे खंडन भी नहीं कर रहे हैं. जबकि सावरकर ने ऐसा कहा है और कई किताबों में इसका ज़िक्र है. अगस्त क्रांति मैदान में किस तरह के नारे लगे. नारे लग रहे थे कि विरोधियों की कब्र खुदेगी सावरकर की धरती पर, जेएनयू की कब्र खुदेगी सावरकर की धरती पर. ममता की कब्र खुदेगी सावरकर की धरती पर. बहरहाल नारे सुने और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी इन्हीं बातों को मंच से दोहराया.

मुंबई के ही आज़ाद मैदान में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन हुआ. आज़ाद मैदान और अगस्त क्रांति मैदान के बीच 4 किमी की दूरी है. आज़ाद मैदान में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध एक बड़ी सभा हुई. इंकलाब मोर्चा के बैनर तले टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, एएमयू, जेएनयू, जामिया मिल्लिया, आईआईटी बांबे और मुंबई यूनिवर्सिटी के कॉलेज के छात्र शामिल हुए. सोचिए मुंबई में दो-दो प्रदर्शन हुए, लेकिन वहां पर कोई इंटरनेट बंद नहीं किया गया है. उमर खालिद, स्वरा भास्कर, ऋचा चड्ढा और वरुण ग्रोवर भी इस सभा में पहुंचे. कई सामाजिक संगठन के लोग भी शामिल हुए. पूजा ने आज़ाद मैदान से रिपोर्टिंग की है.

Saturday, 21 December 2019

एनआरसी से जुड़ी मुख्य बातें

देश की संसद में सिटिजनशिप एमेंडमेंट बिल (नागरिकता संशोधन विधेयक) पास होते ही NRC या नागरिकता रजिस्टर की चर्चा शुरू हो गयी थी. खास तौर पर देश के विपक्षी दलों में एनआरसी के मसले पर काफी चिंताएं देखी गयी थी.

लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि मानकर चलिए NRC आने वाला है. इस वक्त सिर्फ असम में एनआरसी की प्रक्रिया चल रही है.


एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बताता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं. जिन लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं हैं, वह अवैध नागरिक कहलाए जाएंगे. एनआरसी के हिसाब से 25 मार्च 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है.




गृह मंत्री ने साफ कहा कि मोदी सरकार देश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) लेकर जरूर आएगी और जब एनआरसी की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी तो देश में एक भी अवैध घुसपैठिया नहीं रह जाएगा.

आज हम आपको एनआरसी से जुड़ी पांच महत्वपूर्ण बातें बता रहे हैं.
1. क्या है एनआरसी?
एनआरसी का मतलब राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर है. NRC के जरिये भारत में अवैध घुसपैठियों की पहचान की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पूर्वोत्तर का गेटवे कहे जाने वाले असम में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हुई और भारत में अवैध रूप से घुसने वाले लोगों की पहचान की जा रही है.

इस समय एनआरसी की प्रक्रिया राज्य के हिसाब से चल रही है. इसकी शुरुआत से ही देश भर में एनआरसी लागू करने की मांग की जा रही है. गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि एनआरसी की मदद से भारत में अवैध रूप से घुसे लोगों की पहचान की जाएगी और उन्हें बाहर निकाला जायेगा.

2.एनआरसी से किसे होगा नुकसान?
सबसे पहले यह जान लीजिये कि अभी एनआरसी एक प्रस्ताव के रूप में ही है. नागरिकता संशोधन कानून 2019 के आने के बाद भारत में अवैध रूप से आने वाले हिंदू, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदाय के लोगों को एनआरसी से भी दिक्कत नहीं होगी.

अगर उनके पास वैध दस्तावेज नहीं हुए तब भी उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाएगी. इसके लिए उन्हें बस यह कहना होगा कि वे पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीडन की वजह से आये हैं.

इस प्रावधान से वास्तव में इन तीनों पड़ोसी देशों से आने वाले मुस्लिमों को दिक्कत हो सकती है. अगर एनआरसी पूरे देश में लागू हो जाता है तो नागरिकता संशोधन कानून 2019 के हिसाब से अवैध रूप से भारत में आये मुसलमानों को दिक्कत हो सकती है.

3. जो एनआरसी में शामिल नहीं हुए उनका क्या होगा?
अगर देश भर में एनआरसी लागू किया जाता है तो जिन लोगों की पहचान अवैध घुसपैठियों के रूप में की जाएगी उन्हें गिरफ्तार किया जायेगा. इसके बाद वे बड़े डिटेंशन सेंटर में रखे जायेंगे. कुछ ऐसा ही असम में होने जा रहा है. इसके बाद विदेश मंत्रालय संबंधित देश से बातचीत करेगा.

अगर नागरिकों की पहचान के पुख्ता सबूत हुए और उनका देश उन्हें स्वीकार करता है तो वे वापस भेज दिए जायेंगे. बीजेपी प्रमुख और देश के गृह मंत्री अमित शाह देश भर में एनआरसी लागू करने की बात कह रहे हैं.

4. क्या पूरे देश में लागू हो जाएगा एनआरसी?
बीजेपी से तकरीबन सभी बड़े नेता देश भर में एनआरसी लागू करने की बात कह चुके हैं. इनमें हरियाणा के सीम मनोहर लाल खट्टर, पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह आदि शामिल हैं.

सांस्कृतिक संगठन आरएसएस ने भी पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात कही है. मौजूदा केंद्र सरकार ने जिस तरह जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के बाद नागरिकता संशोधन कानून 2019 पर पहल की है, उसे देखते हुए देशभर में एनआरसी लागू करना कोई मुश्किल काम नहीं है.

5. एनआरसी के लिए कौन से दस्तावेज चाहिए?
अगर आप खुद को भारत का नागरिक सिद्ध करना चाहते हैं तो आपके पास 1951 से पहले के दस्तावेज होने चाहिए. एनआरसी लागू होने के बाद आपके पास 1951 से पहले का निवास प्रमाण, भूमि संबंधी कागजात और किरायेदार रिकॉर्ड, पासपोर्ट, एलआईसी पॉलिसी और एजुकेशनल सर्टिफिकेट आदि की जरूरत है.

असम में नागरिकता साबित करने के लिए मांगे गए दस्तावेज इस तरह हैं:
  1. 25 मार्च 1971 तक इलेक्ट्रोल रोल
  2. 1951 का एनआरसी
  3. किरायेदारी के रिकॉर्ड
  4. सिटीजनशिप सर्टिफिकेट
  5. रेजिडेंट सर्टिफिकेट
  6. पासपोर्ट
  7. बैंक और बीमा दस्तावेज
  8. परमानेंट रेजिडेंट सर्टिफिकेट
  9. एजुकेशन सर्टिफिकेट या कोर्ट ऑर्डर रिकॉर्ड
  10. रिफ्यूजी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट

नागरिकता संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 पर पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार कर दिया है. नागरिकता संशोधन कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता कानून 2019 पर रोक लगाने से साफ तौर पर इनकार कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि केंद्र सरकार को नागरिकता कानून पर नोटिस जारी किया है और जवाब मांगा है. अब इस मामले की सुनवाई 22 जनवरी को होगी.


सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस सूर्य कांत की बेंच ने नागरिकता संशोधन कानून 2019 प पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले को अगले साल जनवरी में सुनेगा.

नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 पर मचे बवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली करीब 60 याचिकाओं पर सुनवाई की.

नागरिकता संशोधन कानून 2019 (सीएए) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कांग्रेस, त्रिपुरा राज परिवार के वंशज प्रद्योत किशोर देव बर्मन और असम गण परिषद समेत कई दलों की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आज सुनवाई की.
इससे पहले प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार (16 दिसंबर) को कहा था कि वह अन्य लंबित याचिकाओं के साथ इन याचिकाओं पर 18 दिसंबर को सुनवाई करेगा.

वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सोमवार को दोनों याचिकाओं को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की अपील करते हुए कहा था कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) द्वारा दायर याचिका के साथ ही इन पर भी सुनवाई की जाए.
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा समेत कई याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई हैं. इन याचिकाओं में नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है.
संशोधित नागरिकता कानून के अनुसार धार्मिक प्रताड़ना के चलते 31 दिसंबर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता दे दी जाएगी.

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने गुरुवार की रात नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2019 को स्वीकृति प्रदान कर दी थी जिसके बाद यह कानून बन गया है.

नागरिकता संशोधन कानून क्या है

नागरिकता संशोधन कानून पर देश भर में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि केंद्र सरकार इस पर कदम पीछे हटाने को तैयार नहीं है। लोकसभा और राज्यसभा में बिल पास होने के बार राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही नागरिकता संशोधन विधेयक ने कानून की शक्ल ले ली

इस कानून से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता खुल गया है। मगर देशभर में विरोध प्रदर्शन जारी है। इसके बावजूद देशवासियों के मन में इस कानून को लेकर कई सारे सवाल हैं। यहां हम आपको इससे जुड़े हर सवाल का जवाब दे रहे हैं...
 

क्या कहता है कानून 
31 दिसंबर, 2014 या उससे पहले भारत आने वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के छह धर्मों के अल्पसंख्यकों को घुसपैठिया नहीं माना जाएगा।

नागरिकता अधिनियम, 1955 अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से प्रतिबंधित करता है।

इसके तहत अवैध प्रवासी वह है:
जिसने वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज़ों के बिना भारत में प्रवेश किया हो।
जो अपने निर्धारित समय-सीमा से अधिक समय तक भारत में रहता है।
इस लाभ को देने के लिए विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम, 1920 के तहत भी छूट देनी होगी ।
वर्ष 1920 का अधिनियम विदेशियों को अपने साथ पासपोर्ट रखने के लिये बाध्य करता है।
1946 का अधिनियम भारत में विदेशियों के आने-जाने को नियंत्रित करता है।


कानून में इन देशों और धर्मों का जिक्र
अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के धार्मिक अल्पसंख्यकों को मिलेगा लाभ।

इन देशों के छह धर्म के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता मिलने का रास्ता खुला।  
ये छह धर्म हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी हैं।

इन शर्तों को पूरा करना होगा 
जिस तारीख से आवेदन करना है, उससे पहले 12 महीनों से भारत में रहना होगा।
कम से कम छह साल भारत में बिताना जरूरी।

इन राज्यों में कानून लागू नहीं
संविधान की छठी अनुसूची में शामिल राज्य व आदिवासी क्षेत्रों में नागरिकता संशोधन कानून लागू नहीं होगा। ये प्रावधान बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत अधिसूचित ‘इनर लाइन’ क्षेत्रों पर भी लागू नहीं होंगे।

असम : कारबी आंगलोंग जिला, बोडोलैंड, नार्थ चाछर हिल्स जिला 
मेघालय : खासी हिल्स, जयंतिया हिल्स और गारो हिल्स जिले 
मेघालय में सिर्फ शिलॉन्ग को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में कानून लागू नहीं होगा
त्रिपुरा के आदिवासी जिले 
मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड 
 
पिछले विधेयक से कैसे अलग नया कानून 
2016 के विधेयक में 11 वर्ष की शर्त को घटाकर 6 वर्ष किया गया था।
नए कानून में इसे घटाकर पांच वर्ष कर दिया गया है।
छठी अनुसूची में शामिल क्षेत्रों को छूट देने का बिंदु भी पिछले विधेयक में नहीं था।
अवैध प्रवास के संबंध में सभी कानूनी कार्यवाही बंद करने का प्रावधान भी नया है।

कानून को लेकर दो तरह के विवाद  
1. जामिया-एएमयू और विपक्ष में इसलिए विरोध 
विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि यह एक धर्म विशेष के खिलाफ है।
यह कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।
अनुच्छेद 14 सभी को समानता की गारंटी देता है।
आलोचकों का कहना है कि धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
यह कानून अवैध प्रवासियों को मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में विभाजित करता है।

अफगानिस्तान, बांग्लादेश व पाकिस्तान के अलावा अन्य पड़ोसी देशों का जिक्र क्यों नहीं।

31 दिसंबर, 2014 की तारीख का चुनाव करने के पीछे का उद्देश्य भी स्पष्ट नहीं।

2. असम समेत पूर्वोत्तर राज्यों में विरोध का कारण 
बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सभी अवैध प्रवासियों को बाहर किया जाए।

राज्य में इस कानून को 1985 के असम समझौते से पीछे हटने के रूप में देखा जा रहा है।

समझौते के तहत सभी बांग्लादेशियों को यहां से जाना होगा, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम।

असम समेत पूर्वोत्तर के कई राज्यों को डर है कि इससे जनांकिकीय परिवर्तन होगा।

सरकार का पक्ष 
इन विदेशियों ने अपने-अपने देशों में भेदभाव व धार्मिक उत्पीड़न झेला।
कानून से गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश व अन्य राज्यों में आए लोगों को राहत मिलेगी।

भारतीय मूल के कई लोग नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नागरिकता पाने में असफल रहे।
वे अपने समर्थन में साक्ष्य देने में भी विफल रहे।
एनआरसी और नागरिकता कानून का संबंध
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानि NRC में सभी भारतीयों का विवरण शामिल है। 

1951 के बाद सिर्फ असम में ही इसे अपडेट किया गया है।

असम में एनआरसी की अंतिम सूची में 19,06,657 लोगों का नाम शामिल नहीं था।

इनमें सिर्फ सात लाख मुस्लिम बांग्लादेशी थे, अन्य 12 लाख हिंदू-सिख समेत दूसरे धर्मों के।

एक विवाद यह भी है कि नागरिकता संशोधन विधेयक से गैर मुस्लिमों के पास नागरिकता का अवसर होगा, लेकिन मुस्लिमों के लिए नहीं।

रद्द भी हो सकती है आपकी नागरिकता 
नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार किसी भी OCI कार्डधारक की नागरिकता इन वजहों से रद्द हो सकती है।
अगर OCI पंजीकरण में कोई धोखाधड़ी सामने आती है।
यदि ऐसा करना भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिये आवश्यक हो।
केंद्र द्वारा अधिसूचित कोई अन्य कानून का उल्लंघन होता है।
उल्लंघन में हत्या जैसे गंभीर अपराध के साथ यातायात नियमों का मामूली उल्लंघन भी शामिल है।

एनआरसी और सीएए में ये हैं मुख्य अंतर
  1. नागरिकता संशोधन कानून 2019 जहां धर्म पर आधारित है, वहीं राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है.
  2. सीएए के तहत मुस्लिम बहुल आबादी वाले देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के कारण भागकर भारत आए हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है.
  3. सीएए में मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया है.
  4. एनआरसी में अवैध अप्रवासियों की पहचान करने की बात कही गई है, चाहे वे किसी भी जाति, वर्ग या धर्म के हों. ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर भेजने का प्रावधान है.
  5. एनआरसी फिलहाल सिर्फ असम में लागू है जबकि सीएए देशभर में लागू होगा.
  6. सीएए भारतीय मुसलमानों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा सकता.
  7. सीएए को लेकर एक गलत धारणा बन गई है कि इस वजह से भारतीय मुसलमान अपने अधिकारों से वंचित हो जाएंगे. सच यह है कि अगर कोई ऐसा करना चाहे तो भी इस कानून के तहत यह संभव नहीं है.
  8. पूर्वोत्तर राज्यों में सीएए का विरोध इसलिए हो रहा है कि क्योंकि लोगों को आशंका है इससे उनके इलाके में अप्रवासियों की तादाद बढ़ जाएगी जिससे उनकी संस्कृति और भाषाई विशिष्टता को खतरा हो सकता है.
  9. केरल, पश्चिम बंगाल और दिल्ली में सीएए का विरोध इस कानून में मुसलमानों को शामिल नहीं किए जाने पर हो रहा है, उनका तर्क है कि यह संविधान के विरुद्ध है.

Thursday, 5 December 2019

हिमाचल प्रदेश से कांगड़ा सांसद किशन कपूर ने कहा अरविंद अरोड़ा समाज को एकजुट करें

 हिमाचल प्रदेश से कांगड़ा सांसद श्री किशन कपूर  ने गुरुवार 5 दिसंबर 2019 मैं एक मुलाकात के दौरान अखिल भारतीय  खत्री युवा महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उनके टीम से बातचीत में कहा कि अरविंद अरोड़ा खत्री समाज को एकजुट करें, खत्री समाज को एक मंच पर लेकर आएं और समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने की कोशिश करें.  समाज में स्वार्थ परता चरम पर पहुंच रही है घर के बुजुर्गों और महिलाओं का सम्मान नहीं हो पा रहा है. 
 समाज में फिर से संस्कारों को पोषित करने की आवश्यकता है और इसके लिए हमें युद्ध स्तर पर अभियान चलाने पड़ेंगे.  उन्होंने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं अरविंद अरोड़ा इस कार्य में सफल होंगे और समाज को एक नई दिशा देने में कामयाबी हासिल करेंगे. 
 इस बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार अजय शर्मा जी ने कहा कि अरविंद अरोड़ा आपके विचारों और चिंतन को पुष्ट करते हुए ही कार्य कर रहे हैं और पूरे समाज को एकजुट करने में लगे हुए हैं मैंने पिछले एक दशक से देख रहा हूं किस तरह से यह अथक और कर्मठ व्यक्ति के रूप में कार्य कर रहे हैं. 
सांसद किशन कपूर जी ने कहा मैं अरविंद अरोड़ा को अपना आशीर्वाद देता हूं कि वह इस कार्य में सफल हो और समाज निर्माण में अपना अतुलनीय योगदान दें. 
अखिल भारतीय  खत्री युवा महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरविंद अरोड़ा ने सांसद जी से कहा मैं आपके चिंतन और उद्देश्य पर शतप्रतिशत खरा उतरूंगा मुझे आपका आशीर्वाद मिल गया है यह आशीर्वाद मेरी ताकत है मेरी प्रेरणा है यह मुझे इस उद्देश्य को पूरा करने में मार्गदर्शन के रूप में कार्य करेगा. 
 यह सुनते ही श्री किशन कपूर जी ने वात्सल्य भाव से अरविंद अरोड़ा के सिर पर हाथ रखा और उनकी पीठ को चार बार थपथपाया. 
 इस मुलाकात में अरविंद अरोड़ा अपनी युवा डेलिगेशन टीम के साथ पहुंचे थे, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार अजय शर्मा जी कार्यालय सचिव कुकरेजा जी,  जितेंद्र जी एवं अन्य साथी गण मौजूद रहे. 

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