एक बार भयानक सूखा पड़ा। सारे फसल नष्ट हो गये और जमीन बंजर हो गई। किसानों ने हार मान ली और बीजों को ना बोने का फैसला लिया। फसल बुवाई का यह चौथा साल था जब बारिश नहीं हुई थी। किसान उदास होकर बैठ गये। वो ताश खेलकर या कोई और काम कर अपना समय बिताने लगे। हालांकि एक किसान था जिसने धैर्य के साथ बीजों को बोया और अपने जमीन की देखभाल भी करता रहा। दूसरे किसान रोजाना यह कहकर उसका मजाक उड़ाते थे कि वह निर्रथक ही अपनी फलरहित और बंजर जमीन की देखभाल कर रहा है। जब वो उनसे उसकी इस बेवकूफी भरी दृढ़ता का कारण पूछते तो वह कहता, “मैं एक किसान हूं और अपनी जमीन की देखभाल करना और उसमें बीज बोना मेरा धर्म है। बारिश हो या ना हो, इससे मेरा धर्म नहीं बदलता। मेरा धर्म मेरा धर्म है और मैं अवश्य ही इसका पालन करुंगा, भले ही इसका फल मुझे मिले या ना मिले।”
दूसरे किसान उसके इस बेकार के प्रयास पर हंसने लगे। फिर वो अपनी बंजर जमीन और बारिश रहित आसमान का विलाप कर अपने-अपने घर चले गये। हालांकि जब वह किसान विश्वास के साथ अपना जवाब दे रहा था, तभी एक बादल वहां से गुजर रहा था।
बादल ने किसान के सुंदर शब्दों को सुना और महसूस किया, “वह सही है।” जमीन की देखभाल करना और बीजों को रोपणा उसका धर्म है और अपने में संग्रहित पानी को धरती पर बरसाना मेरा धर्म है।” उसी पल, किसान के संदेश से प्रेरित होकर बादल ने खुद में जमा सारे पानी को बारिश के रूप में किसान की भूमि के उपर छोड़ दिया। इस बादल ने धर्म का यह संदेश दूसरे बादलों तक पहुंचाना भी जारी रखा और जिस कारण वो भी बारिश कर अपना-अपना धर्म निभाने लगे। जल्द ही सारे बादल जमीन पर बारिश करने लगे और इससे किसान की खेती भरपूर रूप से हुई।
मनुष्य को केवल इस रूप में स्वीकार करते हैं भगवान
परमहंस आश्रम में एक संत जोश-जोश में अधिक भावुक हो गया। सामूहिक रूप से हो रहे जाप के मध्य में वो रोने लगा और भगवान का नाम लेकर जमीन पर लोटने लगा। कुछ संतो को ऐसा करना पसंद ना आया। लेकिन जब इसके बारे में योगानंद को बताया गया तो उन्होंने कहा, “आह – काश कि आप सबों में उस तरह का उत्साह भरा होता!” हमें यह समझने की आवश्यकता है कि भगवान के लिए क्या जरूरी है। हमें शायद पता है कि आध्यात्मिक जीवन किस चीज के बारे में है। लेकिन भगवान हमारे सोच की परवाह नहीं करते हैं। और ना ही वो हमारी भावनाओं और छवि की परवाह करते हैं जो हमने खुद के सामने और दुनिया के सामने बनाई है।
भगवान हमें बिल्कुल वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे हम वाकई में हैं। और हम जिस भी रूप में है, उसे हमने अपनी चेतना से जन्म दिया है। हमारी चेतना हमारे जीवन के कर्मों, विचारों, और सभी जरूरी भावनाओं को आकार प्रदान करती है।19वीं सदी के एक महान बंगाली संत, श्री रामकृष्ण के एक शिष्य एक बार आश्रम में नृतकों, गायकों और कलाकारों के एक समूह को लेकर आये। मनोरंजन करने वाले निम्न जाति के थे, लेकिन रामकृष्ण ने उन्हें गले से लगा लिया और उनके प्रति अपना प्रेम व्यक्त किया।
उनलोगों के जाने के बाद कुछ संकीर्ण सोच वाले उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि आपने ऐसे छोटे वर्ग वाले लोगों का स्वागत क्यों किया? तो उस महान योगी ने कहा, “अब जिस भगवान की वो लोग पूजा करते हैं, वो नृत्य और संगीत है।” उन्होंने आनंदित होकर कहा, “आह – लेकिन वो जानते हैं कि अपने भगवान की पूजा कैसे करनी है।” और इसी से भगवान प्रसन्न होते हैं। यह हमारी तरह खुद को दुनिया के समाने सावधानी से या सुनियोजित रूप से प्रस्तुत नहीं करते हैं।
मृत्यु का अर्थ है भौतिक शरीर से आत्मा का जुदा होना है। मृत्यु नये और बेहतर जीवन का एक प्रारंभिक बिन्दु बन जाता है। यह जीवन के उच्च रूप का द्वार खोलता है। यह संपूर्ण जीवन का केवल एक प्रवेशद्वार है। जन्म और मृत्यु माया के मायाजाल हैं। जन्म लेते ही मरने की शुरुआत हो जाती है और मरते ही जीवन की शुरुआत हो जाती है। जन्म और मृत्यु इस संसार के मंच पर प्रवेश करने और बाहर जाने का द्वार मात्र है। वास्तव में ना तो कोई आता है और ना ही कोई जाता है। केवल ब्रह्म और अनंत का ही अस्तित्व होता है। जैसे आप घर से दूसरे घर में जाते हैं, वैसे ही आत्मा अनुभव प्राप्त करने के लिए एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। जैसे मनुष्य़ पुराने कपड़े छोड़कर नए कपड़े पहनता है, बिलकुल वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। मृत्यु जीवन का अंत नहीं है। जीवन एक कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है। यह निरंतर चलती ही रहती है। मृत्यु एक जरूरी घटना है जिसका अनुभव हर आत्मा को भविष्य में विकास करने के लिए करना है। एक विवेकी और बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी मौत से नहीं डरता है।
हर आत्मा एक चक्र है।
इस चक्र की परिधि कहीं भी खत्म नहीं होती लेकिन इसका केन्द्र हमारा शरीर है। तो फिर, मौत से क्यों डरना चाहिए? परमात्मा या सर्वोच्च आत्मा मृत्युरहित, कालातीत, निराधार और असीम है। यह शरीर, मन और पूरे संसार के लिए एक केन्द्र है। मृत्यु केवल भौतिक शरीर को प्राप्त होती है, जो पांच तत्वों से बना है। मृत्यु शाश्वत आत्मा को कैसे मार सकती है जो समय, स्थान और कर्म से परे है? अगर आप जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाना चाहते हैं तो आपको शरीरविहीन होना होगा। शरीर हमारे कर्मों का परिणाम है। आपको कोई भी कार्य फल की उम्मीद किए बिना ही करना चाहिए। अगर आप खुद को रागद्वेष या पसंद और नापसंद से मुक्त कर लेते हैं, तो आप खुद को कर्म से भी मुक्त कर लेंगे। आप केवल अहंकार को ही खत्म कर खुद को ‘राग’ और ‘द्वेष’ से मुक्त कर सकते हैं। जब अविनाशी ज्ञान के द्वारा अज्ञानता का अंत हो सकता है तो आप अहंकार का भी विनाश कर सकते हैं। इसलिये इस शरीर के जड़ का कारण यह अज्ञानता है। जिसने भी उस अमर आत्मा का एहसास कर लिया जो सभी ध्वनि, दृश्य, स्वाद और स्पर्श से परे है, जो निराकार और निर्गुण है, जो प्रक़ृति से परे है, जो तीन शरीर और पांच तत्वों से परे है, जो अनंत और अपरिवर्तनीय है, उसने खुद को मौत के मुंह से आजाद कर लिया।
जीव या व्यक्तिगत आत्मा अपने कार्यों को प्रदर्शित करने के लिए और अनुभव प्राप्त करने के लिए अनेक शरीर धारण करती है। वो शरीर में प्रवेश करती है और फिर जब वह शरीर जीने लायक नहीं रहता, तो उसे त्याग देती है। वह फिर से एक नए शरीर का निर्माण करती और पुन: वही प्रक्रिया दोहराती है। यह प्रक्रिया स्थानांतरगमन कहलाती है। किसे नये शरीर में आत्मा का प्रवेश करना जन्म कहलाता है। शरीर से आत्मा का अलग हो जाना मृत्यु कहलाता है। अगर शरीर में आत्मा न हो तो वह शरीर मृत शरीर है और इसे प्राकृतिक मृत्यु कहते हैं। एककोशकीय जीवों के लिए प्राकृतिक मृत्यु अज्ञात है। जब पृथ्वी पर ऐसे जीवों को जीवन मिलता है तो उनकी मृत्यु अज्ञात होती है। यह घटना केवल बहुकोशकीय जीवों के साथ ही होती है। प्रयोगशालाओं के शोधों से पता चला है कि किसी के जीवन की समाप्ति के बाद भी उसके अंग काम कर सकते हैं। मृत्यु के बाद भी कई महीनों तक सफेद रक्तकण शरीर में जीवित रहते हैं। मृत्यु जीवन का अंत नहीं है। यह महज एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व की समाप्ति है। जीवन संसार पर विजय पाने के लिए चलती रहती है। यह तब तक चलती रहती है जबतक यह अनंत में विलीन नहीं हो जाती।
दूसरे किसान उसके इस बेकार के प्रयास पर हंसने लगे। फिर वो अपनी बंजर जमीन और बारिश रहित आसमान का विलाप कर अपने-अपने घर चले गये। हालांकि जब वह किसान विश्वास के साथ अपना जवाब दे रहा था, तभी एक बादल वहां से गुजर रहा था।
बादल ने किसान के सुंदर शब्दों को सुना और महसूस किया, “वह सही है।” जमीन की देखभाल करना और बीजों को रोपणा उसका धर्म है और अपने में संग्रहित पानी को धरती पर बरसाना मेरा धर्म है।” उसी पल, किसान के संदेश से प्रेरित होकर बादल ने खुद में जमा सारे पानी को बारिश के रूप में किसान की भूमि के उपर छोड़ दिया। इस बादल ने धर्म का यह संदेश दूसरे बादलों तक पहुंचाना भी जारी रखा और जिस कारण वो भी बारिश कर अपना-अपना धर्म निभाने लगे। जल्द ही सारे बादल जमीन पर बारिश करने लगे और इससे किसान की खेती भरपूर रूप से हुई।
मनुष्य को केवल इस रूप में स्वीकार करते हैं भगवान
परमहंस आश्रम में एक संत जोश-जोश में अधिक भावुक हो गया। सामूहिक रूप से हो रहे जाप के मध्य में वो रोने लगा और भगवान का नाम लेकर जमीन पर लोटने लगा। कुछ संतो को ऐसा करना पसंद ना आया। लेकिन जब इसके बारे में योगानंद को बताया गया तो उन्होंने कहा, “आह – काश कि आप सबों में उस तरह का उत्साह भरा होता!” हमें यह समझने की आवश्यकता है कि भगवान के लिए क्या जरूरी है। हमें शायद पता है कि आध्यात्मिक जीवन किस चीज के बारे में है। लेकिन भगवान हमारे सोच की परवाह नहीं करते हैं। और ना ही वो हमारी भावनाओं और छवि की परवाह करते हैं जो हमने खुद के सामने और दुनिया के सामने बनाई है।
भगवान हमें बिल्कुल वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे हम वाकई में हैं। और हम जिस भी रूप में है, उसे हमने अपनी चेतना से जन्म दिया है। हमारी चेतना हमारे जीवन के कर्मों, विचारों, और सभी जरूरी भावनाओं को आकार प्रदान करती है।19वीं सदी के एक महान बंगाली संत, श्री रामकृष्ण के एक शिष्य एक बार आश्रम में नृतकों, गायकों और कलाकारों के एक समूह को लेकर आये। मनोरंजन करने वाले निम्न जाति के थे, लेकिन रामकृष्ण ने उन्हें गले से लगा लिया और उनके प्रति अपना प्रेम व्यक्त किया।
उनलोगों के जाने के बाद कुछ संकीर्ण सोच वाले उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि आपने ऐसे छोटे वर्ग वाले लोगों का स्वागत क्यों किया? तो उस महान योगी ने कहा, “अब जिस भगवान की वो लोग पूजा करते हैं, वो नृत्य और संगीत है।” उन्होंने आनंदित होकर कहा, “आह – लेकिन वो जानते हैं कि अपने भगवान की पूजा कैसे करनी है।” और इसी से भगवान प्रसन्न होते हैं। यह हमारी तरह खुद को दुनिया के समाने सावधानी से या सुनियोजित रूप से प्रस्तुत नहीं करते हैं।
मृत्यु का अर्थ है भौतिक शरीर से आत्मा का जुदा होना है। मृत्यु नये और बेहतर जीवन का एक प्रारंभिक बिन्दु बन जाता है। यह जीवन के उच्च रूप का द्वार खोलता है। यह संपूर्ण जीवन का केवल एक प्रवेशद्वार है। जन्म और मृत्यु माया के मायाजाल हैं। जन्म लेते ही मरने की शुरुआत हो जाती है और मरते ही जीवन की शुरुआत हो जाती है। जन्म और मृत्यु इस संसार के मंच पर प्रवेश करने और बाहर जाने का द्वार मात्र है। वास्तव में ना तो कोई आता है और ना ही कोई जाता है। केवल ब्रह्म और अनंत का ही अस्तित्व होता है। जैसे आप घर से दूसरे घर में जाते हैं, वैसे ही आत्मा अनुभव प्राप्त करने के लिए एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। जैसे मनुष्य़ पुराने कपड़े छोड़कर नए कपड़े पहनता है, बिलकुल वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। मृत्यु जीवन का अंत नहीं है। जीवन एक कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है। यह निरंतर चलती ही रहती है। मृत्यु एक जरूरी घटना है जिसका अनुभव हर आत्मा को भविष्य में विकास करने के लिए करना है। एक विवेकी और बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी मौत से नहीं डरता है।
हर आत्मा एक चक्र है।
इस चक्र की परिधि कहीं भी खत्म नहीं होती लेकिन इसका केन्द्र हमारा शरीर है। तो फिर, मौत से क्यों डरना चाहिए? परमात्मा या सर्वोच्च आत्मा मृत्युरहित, कालातीत, निराधार और असीम है। यह शरीर, मन और पूरे संसार के लिए एक केन्द्र है। मृत्यु केवल भौतिक शरीर को प्राप्त होती है, जो पांच तत्वों से बना है। मृत्यु शाश्वत आत्मा को कैसे मार सकती है जो समय, स्थान और कर्म से परे है? अगर आप जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाना चाहते हैं तो आपको शरीरविहीन होना होगा। शरीर हमारे कर्मों का परिणाम है। आपको कोई भी कार्य फल की उम्मीद किए बिना ही करना चाहिए। अगर आप खुद को रागद्वेष या पसंद और नापसंद से मुक्त कर लेते हैं, तो आप खुद को कर्म से भी मुक्त कर लेंगे। आप केवल अहंकार को ही खत्म कर खुद को ‘राग’ और ‘द्वेष’ से मुक्त कर सकते हैं। जब अविनाशी ज्ञान के द्वारा अज्ञानता का अंत हो सकता है तो आप अहंकार का भी विनाश कर सकते हैं। इसलिये इस शरीर के जड़ का कारण यह अज्ञानता है। जिसने भी उस अमर आत्मा का एहसास कर लिया जो सभी ध्वनि, दृश्य, स्वाद और स्पर्श से परे है, जो निराकार और निर्गुण है, जो प्रक़ृति से परे है, जो तीन शरीर और पांच तत्वों से परे है, जो अनंत और अपरिवर्तनीय है, उसने खुद को मौत के मुंह से आजाद कर लिया।
जीव या व्यक्तिगत आत्मा अपने कार्यों को प्रदर्शित करने के लिए और अनुभव प्राप्त करने के लिए अनेक शरीर धारण करती है। वो शरीर में प्रवेश करती है और फिर जब वह शरीर जीने लायक नहीं रहता, तो उसे त्याग देती है। वह फिर से एक नए शरीर का निर्माण करती और पुन: वही प्रक्रिया दोहराती है। यह प्रक्रिया स्थानांतरगमन कहलाती है। किसे नये शरीर में आत्मा का प्रवेश करना जन्म कहलाता है। शरीर से आत्मा का अलग हो जाना मृत्यु कहलाता है। अगर शरीर में आत्मा न हो तो वह शरीर मृत शरीर है और इसे प्राकृतिक मृत्यु कहते हैं। एककोशकीय जीवों के लिए प्राकृतिक मृत्यु अज्ञात है। जब पृथ्वी पर ऐसे जीवों को जीवन मिलता है तो उनकी मृत्यु अज्ञात होती है। यह घटना केवल बहुकोशकीय जीवों के साथ ही होती है। प्रयोगशालाओं के शोधों से पता चला है कि किसी के जीवन की समाप्ति के बाद भी उसके अंग काम कर सकते हैं। मृत्यु के बाद भी कई महीनों तक सफेद रक्तकण शरीर में जीवित रहते हैं। मृत्यु जीवन का अंत नहीं है। यह महज एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व की समाप्ति है। जीवन संसार पर विजय पाने के लिए चलती रहती है। यह तब तक चलती रहती है जबतक यह अनंत में विलीन नहीं हो जाती।
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