Tuesday, 19 February 2019

आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा

केन्द्र सरकार ने सोमवार को कैबिनेट बैठक में बड़ा फैसला लेते हुए आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है।  सरकार ये आरक्षण उन सवर्णों को देगी जिनकी सालाना आय आठ लाख रुपये से कम है। इसके लिए संविधान में संशोधन के लिए संसद के चालू सत्र में बिल लाया जाएगा। आपको बता दें कि मौजूदा कानून में 49.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।


प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, इसके लिए संविधान में संशोधन के लिए संसद के चालू सत्र में बिल लाया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन  सरकार संसद में बिल ला सकती है।

सरकार की ओर से यह फैसला तब आया है जब लोकसभा चुनाव होने में महज कुछ ही महीनों का समय बचा है। इससे पहले दलित नेता और मंत्री रामदास अठावले ने पहले सवर्ण जातियों के लिए आरक्षण देने की वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि सवर्ण जातियों को 25 फीसदी आरक्षण दिया जाना चाहिए।यह मौजूदा 50 प्रतिशत आरक्षण से अलग होगा। एक सूत्र ने बताया, 'आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा जिन्हें अभी आरक्षण का फायदा नहीं मिल रहा है।'कैबिनेट के सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने के फैसले से पहले अनुसूचित जाति  को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति  को 7.5 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।


सूत्रों ने कहा कि सामान्य वर्ग को अभी आरक्षण हासिल नहीं है। एक सूत्र ने बताया, ''आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा जिन्हें अभी आरक्षण का फायदा नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आरक्षण का लाभ उन्हें मिलने की उम्मीद है जिनकी वार्षिक आय आठ लाख रूपये से कम होगी और पांच एकड़ तक जमीन होगी। सूत्रों ने बताया कि फैसले को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन करना होगा। आपको बता दें कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में अनुसूचित जाति (SC) को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति (ST)  को 7.5 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।


आपको बता दें कि आरक्षण की शुरुआत आजादी के पहले प्रसिडेंसी और रियासतों में पिछड़े  वर्गों के लिए शुरू हुई थी। 1901 में महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने गरीबी दूर करने के लिए पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की शुरुआत की थी। इसके बाद अंग्रेजों ने 1908 में आरक्षण शुरू किया था। मद्रास प्रेसिडेंसी ने 1921 में 44 फीसदी गैर-ब्राह्मण, 16-16 फीसदी ब्राह्मण, मुसलमान और भारतीय-एंग्लो/ईसाई को और अनुसूचित जातियों को लोगों को 8 फीसदी आरक्षण दिया गया था।

इसके बाद 1935 में भारत सरकार अधिनियम के तहत लोगों को सरकारी आरक्षण सुनिश्चित किया था। बाबा साहब अम्बेडकर ने 1942 में सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग उठाई थी।

क्या है आरक्षण का उद्देश्य
आरक्षण देने का उद्देश्य केंद्र और राज्य में शिक्षा के क्षेत्र, सरकारी नौकरियों, चुनाव और कल्याणकारी योजनाओं में हर वर्ग की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए की गई। जिससे समाज के हर वर्ग को आगे आने का मौका मिले।

वहीं आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, 'आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्ण जातियों के लिये मोदी सरकार ने 10% आरक्षण का स्वागत योग्य चुनावी जुमला छोड़ दिया है, ऐसे कई फैसले राज्यों ने समय-समय पर लिये लेकिन 50% से अधिक आरक्षण पर कोर्ट ने रोक लगा दी क्या ये फैसला भी कोर्ट से रोक लगवाने के लिये एक नौटंकी है'। इसके बाद एक अन्य ट्विट में संजय सिंह ने लिखा-10% आरक्षण बढ़ाने के लिये संविधान संशोधन करना होगा सरकार विशेष सत्र बुलाये, हम सरकार का साथ देंगे वरना ये फैसला चुनावी जुमला मात्र साबित होगा। इस ट्विट को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी रिट्वीट किया है।

वहीं नेशनल कांन्फ्रेंस के नेता उमर अबदुल्ला ने कहा है कि गरीब सवर्णों को आरक्षण का ऐलान साबित करता है कि चुनाव का बिगुल अच्छे से बजाया जा चुका है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले ने उच्च जातियों के बीच आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कदम का स्वागत किया है।

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10% आरक्षण देने का प्रस्ताव एक जुमले से ज्यादा कुछ नहीं है। यह कानूनी पेचीदगियों से भरा हुआ है और संसद के दोनों सदनों से इसे पारित करने का कोई समय नहीं है। सरकार पूरी तरह से बेनकाब है।



सवर्णों के लिए क्यों जरूरी है आरक्षण, जानिए वे पांच कारण

1- सवर्णों में भी हैं गरीब
यह आम धारणा है कि सवर्ण का मतलब होता है समर्थ लेकिन यह सही नहीं है। सवर्णों में भी आर्थिक रूप से कमजोर लोग हैं। यह आंकड़ों से भी साबित हो चुका है। इसके मद्देनजर आरक्षण उनकी जायज मांग है।

2- खेती की खराब हालत
पिछले कुछ सालों से कृषि क्षेत्र और किसानों की हालत खराब हुई है। फसल उगाने के लिए पहले से ज्यादा निवेश करना पड़ रहा है जबकि उससे बहुत अच्छा रिटर्न नहीं मिल रहा है। इससे न सिर्फ सवर्ण बल्कि अन्य जातियां भी प्रभावित हुई हैं लेकिन आरक्षण के कारण अन्य जातियों को इससे बचने में मदद मिली है जबकि आर्थिक रूप से सवर्ण के पास कोई चारा नहीं है।

- शहरों में रोजगार में कमी
शहरी इलाकों में रोजगार के घटते अवसरों के कारण भी लोगों में असंतोष है। खासकर निजी क्षेत्र में पहले कम नौकरियां हैं। जहां तक सार्वजनिक क्षेत्र की बात है तो वहां आरक्षण के कारण सवर्णों के लिए बहुत कम मौके हैं।

4- आरक्षण का फायदा
आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के महसूस हो रहा है कि बिना आरक्षण के उनका कल्याण संभव नहीं है क्योंकि अपनी आंखों के सामने देख रहे हैं कि कैसे एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के लोग आरक्षण का फायदा उठाकर आगे बढ़ रहे हैं। न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हुई है बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी वे मजबूत हुए हैं।

राजनीतिक समर्थन
सवर्णों को आरक्षण की मांग बहुत पुरानी है। इसे राजनीतिक समर्थन भी प्राप्त है। दरअसल, कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसी नहीं है जो इसका विरोध करने का साहस कर सके। यहां तक कि बसपा जैसी पार्टी भी सवर्णों के लिए आरक्षण की वकालत कर चुकी है।

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