जबकि कुंभ मेले में नागा बाबाओं ने हमेशा की तरह पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया है और देशभर के श्रद्धालु वहां पहुंचकर बेहतरीन बंदोबस्त के बीच अपनी धार्मिक आस्थाओं को फलीभूत होते देखने के आनंद में मग्न हैं, इधर बहुत धीरे से चुनावी सरगर्मी बढ़ गई है।
सरसरी तौर पर देखने पर तो तमाम राजनीतिक घटनाएं सामान्य नजर आ रही हैं, लेकिन गहरी नजर डालने पर साफ मालूम पड़ जाता है कि इनके तार आने वाले लोकसभा चुनावों से जुड़े हुए हैं। अव्वल तो नमो और रागा में फिर पुरानी जंग छिड़ चुकी है। लगभग रोज ही दोनों एक दूसरे की ओर सद्भावनाओं से एकदम खाली और दुर्भावनाओं से पूरी तरह भरी हुई मिसाइलें छोड़ रहे हैं। कोलकाता में सीबीआई को लेकर राज्य और केंद्र के बीच जो शक्ति प्रदर्शन हुआ, वह आने वाले दिनों में क्या-क्या रंग दिखा सकता है, लोग भांप चुके हैं। शांति प्रिय नागरिकों के मन में डर अपनी पैठ बना चुका है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वह कोई भी हो, कितना भी बड़ा नेता रहा हो या अभी भी हो, कितना भी बड़ा मंत्री रहा हो या अभी भी हो, अगर गलत काम किया, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। इसीलिए वाड्रा और चिदंबरम को अगर ईडी और सीबीआई के अफसरों की पूछताछ में शामिल होना पड़ रहा है, तो इसमें गलत कुछ नहीं। और अगर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व मंत्रियों या भाजपा के खिलाफ खड़ी पार्टियों मसलन सपा और बसपा के मुलायम, मायावती अखिलेश आदि पर भी सीबीआई शिकंजे कस रही है, तो ऐसा होना ही चाहिए। भारतीय जनता की खून पसीने की कमाई को कोई भी नेता, चाहे वह किसी भी पार्टी का क्यों न हो, अपनी तिजोरी भरने या अपने निजी ऐश्वर्य के लिए इस्तेमाल करता है, तो उसके खिलाफ जांच होनी ही चाहिए और दोषी पाए जाने पर उसे सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन क्या वाकई इस मुल्क में कभी ऐसा होगा?
राजनीति में पदार्पण करनेवाले ज्यादातर लोग सिर्फ सत्ता के बारे में बात करते हैं, सिर्फ सत्ता के बारे में सोचते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जरूर प्रधान सेवक होने की बात की थी, लेकिन वह बात सिर्फ बात ही बन कर रह गई। एक प्रगतिशील राष्ट्र में वैचारिक बहसें चलनी चाहिए, सेवा की नई मिसालें कायम होनी चाहिए, गरीबों और हाशिए पर जी रहे नागरिकों को ऊपर उठाने के तरीकों पर विचार-विमर्श होना चाहिए, पर हमारे देश में यही सब नहीं हो रहा। शिक्षा के मामले में दुनिया एक से बढ़कर एक नामी विश्वविद्यालयों से पटी हुई है, पर हमारे संस्थानों का आज भी कहीं कोई स्थान नहीं, इस स्थिति पर कोई बातचीत नहीं हो रही। इसके बारे में क्या कहा जाए कि हमारे पास तीस करोड़ से ज्यादा उपभोक्ताओं का मध्यवर्ग है, फिर भी अर्थव्यवस्था और रोजगार पैदा करने के मामले में हम कोई कमाल नहीं कर पा रहे। रोजगार पर कोई चर्चा ही नहीं हुई और जब हुई तो इसलिए कि सरकार बेराजगारी बढ़ने के आंकड़े दबाए बैठी थी।
सरसरी तौर पर देखने पर तो तमाम राजनीतिक घटनाएं सामान्य नजर आ रही हैं, लेकिन गहरी नजर डालने पर साफ मालूम पड़ जाता है कि इनके तार आने वाले लोकसभा चुनावों से जुड़े हुए हैं। अव्वल तो नमो और रागा में फिर पुरानी जंग छिड़ चुकी है। लगभग रोज ही दोनों एक दूसरे की ओर सद्भावनाओं से एकदम खाली और दुर्भावनाओं से पूरी तरह भरी हुई मिसाइलें छोड़ रहे हैं। कोलकाता में सीबीआई को लेकर राज्य और केंद्र के बीच जो शक्ति प्रदर्शन हुआ, वह आने वाले दिनों में क्या-क्या रंग दिखा सकता है, लोग भांप चुके हैं। शांति प्रिय नागरिकों के मन में डर अपनी पैठ बना चुका है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वह कोई भी हो, कितना भी बड़ा नेता रहा हो या अभी भी हो, कितना भी बड़ा मंत्री रहा हो या अभी भी हो, अगर गलत काम किया, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। इसीलिए वाड्रा और चिदंबरम को अगर ईडी और सीबीआई के अफसरों की पूछताछ में शामिल होना पड़ रहा है, तो इसमें गलत कुछ नहीं। और अगर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व मंत्रियों या भाजपा के खिलाफ खड़ी पार्टियों मसलन सपा और बसपा के मुलायम, मायावती अखिलेश आदि पर भी सीबीआई शिकंजे कस रही है, तो ऐसा होना ही चाहिए। भारतीय जनता की खून पसीने की कमाई को कोई भी नेता, चाहे वह किसी भी पार्टी का क्यों न हो, अपनी तिजोरी भरने या अपने निजी ऐश्वर्य के लिए इस्तेमाल करता है, तो उसके खिलाफ जांच होनी ही चाहिए और दोषी पाए जाने पर उसे सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन क्या वाकई इस मुल्क में कभी ऐसा होगा?
राजनीति में पदार्पण करनेवाले ज्यादातर लोग सिर्फ सत्ता के बारे में बात करते हैं, सिर्फ सत्ता के बारे में सोचते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जरूर प्रधान सेवक होने की बात की थी, लेकिन वह बात सिर्फ बात ही बन कर रह गई। एक प्रगतिशील राष्ट्र में वैचारिक बहसें चलनी चाहिए, सेवा की नई मिसालें कायम होनी चाहिए, गरीबों और हाशिए पर जी रहे नागरिकों को ऊपर उठाने के तरीकों पर विचार-विमर्श होना चाहिए, पर हमारे देश में यही सब नहीं हो रहा। शिक्षा के मामले में दुनिया एक से बढ़कर एक नामी विश्वविद्यालयों से पटी हुई है, पर हमारे संस्थानों का आज भी कहीं कोई स्थान नहीं, इस स्थिति पर कोई बातचीत नहीं हो रही। इसके बारे में क्या कहा जाए कि हमारे पास तीस करोड़ से ज्यादा उपभोक्ताओं का मध्यवर्ग है, फिर भी अर्थव्यवस्था और रोजगार पैदा करने के मामले में हम कोई कमाल नहीं कर पा रहे। रोजगार पर कोई चर्चा ही नहीं हुई और जब हुई तो इसलिए कि सरकार बेराजगारी बढ़ने के आंकड़े दबाए बैठी थी।
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