Tuesday, 19 February 2019

उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में कांग्रेस

उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में कांग्रेस जिस तेवर के साथ उतरी है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। प्रियंका गांधी को आगे कर पार्टी नए सिरे से अपनी जमीन तलाश रही है। उसका यह आत्मविश्वास तीन राज्यों की जीत से आया है। वैसे 2009 के लोकसभा चुनाव में वह एसपी-बीएसपी की बराबरी पर भी आ चुकी है। हालांकि तब कल्याण सिंह को लाल टोपी पहनाने के कारण मुस्लिम मुलायम सिंह से नाराज थे और उन्होंने कांग्रेस का समर्थन कर दिया था। पर आज की स्थिति अलग है। बीजेपी से सीधे मुकाबले में कांग्रेस को कामयाबी वहीं मिलती है जहां सीधा मुकाबला हो और दूसरे वोट बैंक भी ठीक-ठाक हों। यूपी में कांग्रेस का बीजेपी से न तो सीधा मुकाबला होने वाला है, न ही उसका वोट बैंक बचा है।

आजमाया हुआ दांव


झंडे साथ आ गए हैं, वोट भी साथ आ जाएं तो बनेगी बात

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद जो भी चुनाव हुए हैं उनमें कांग्रेस समाजवादी पार्टी (एसपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से नीचे ही रही है। आज भी बीजेपी के वोट के मुकाबले एसपी और बीएसपी का साझा वोट बैंक ही है, किसी दूसरे का नहीं। फूलपुर, गोरखपुर और कैराना के उपचुनाव इसकी पुष्टि करते हैं। दरअसल आज भी इन दोनों दलों के पास दलित, पिछड़ा और मुस्लिम का बड़ा वोट बैंक है। यही वजह है कि बीजेपी के सामने यूपी में असल चुनौती एसपी-बीएसपी गठबंधन नजर आ रहा है। बीते सोमवार को कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी के रोड शो में जुटी भीड़ से बहुत लोग मानने लगे कि कांग्रेस राज्य में बड़ी ताकत बनने जा रही है। पर हालात कुछ अलग दिखते हैं। सिर्फ चेहरा और भीड़ के आधार पर वोट का समीकरण नहीं बन पाता। पिछले डेढ़ दशक में यूपी की राजनीति मुख्य रूप से एसपी-बीएसपी के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रही है। पहली बार एसपी-बीएसपी साथ आईं तो बीजेपी सत्ता की राजनीति में काफी पिछड़ गई। नारा लगा, ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय…’। यह प्रयोग कई वजहों से नाकाम हुआ पर प्रदेश की राजनीति पर दोनों पार्टियों का दबदबा तमिलनाडु के डीएमके-एआईडीएमके की तर्ज पर बना रहा। एक जाता तो दूसरा आ जाता। यह सिलसिला नरेंद्र मोदी के आने तक चलता रहा।

मोदी के आने के बाद लोकसभा में बीएसपी का सूपड़ा साफ हो गया तो एसपी और कांग्रेस का सिर्फ परिवार ही बचा। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और एसपी एक साथ आईं पर राहुल और अखिलेश मिलकर भी बीजेपी की आंधी को नहीं रोक पाए। बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला। यह उस राजनीतिक प्रचार का असर था कि एसपी राज में सिर्फ मुस्लिम-यादव की चलती है जबकि बीएसपी राज में दलित-मुस्लिम की। इन दोनों दलों पर जातीय भेदभाव का आरोप चस्पा हो गया। वैसे मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में कहा जाता है कि वे चार साल ग्यारह महीने राजपूत रहते हैं और चुनाव वाले महीने में हिंदू हो जाते हैं। पर हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी राज्य में भारी बहुमत से जीत कर आई। साथ ही उसने पिछड़ों को भी साधा। छोटे-छोटे दलों से समझौता कर अपना वोट बैंक बढ़ाया, जबकि एसपी और बीएसपी के वोट बैंक का कोई विस्तार नहीं हुआ। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ लड़कर बुरी तरह हार गईं। इस हार के साथ यह भी तय हो गया कि मोदी वाली बीजेपी का मुकाबला दोनों दल अकेले नहीं कर सकते हैं।

फूलपुर और गोरखपुर के उप चुनाव ने दोनों पार्टियों के गठबंधन की नींव तैयार की। बाद में केंद्र ने जिस तरह सीबीआई का राजनीतिक इस्तेमाल क्षेत्रीय दलों को तोड़ने-फोड़ने के लिए किया, उससे इस गठबंधन को और मजबूती मिली। एसपी-बीएसपी गठबंधन में कांग्रेस भी आ सकती थी, लेकिन छत्तीसगढ़ ,राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने बीएसपी के साथ जो व्यवहार किया, उसका असर यूपी पर भी पड़ा। बीएसपी के चलते एसपी ने भी हाथ खींच लिए वर्ना मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ उसका समझौता हो सकता था। दूसरे, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर दिया है। ऐसे में बीएसपी के साथ-साथ एसपी का भी दूर छिटक जाना लाजमी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस एसपी-बीएसपी के मुस्लिम वोट बैंक में कुछ सीटों पर भले ही सेंध लगा ले, पर ज्यादातर सीटों पर वह बीजेपी के अगड़े वोट बैंक में ही कतर-ब्योंत करेगी। दलित-पिछड़ा वोट बैंक पर कांग्रेस की अभी इतनी पकड़ नहीं है कि वह एसपी-बीएसपी गठबंधन को ज्यादा नुकसान पहुंचा सके। बल्कि अलग लड़कर वह इस गठबंधन को फायदा ही पहुंचाएगी। ठीक उसी तरह जैसे एक दौर में वीपी सिंह ने अनिल अंबानी के दादरी प्रॉजेक्ट को लेकर मुलायम सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ा था। वामपंथी समेत बहुत से छोटे-छोटे दल वीपी सिंह के जनमोर्चा गठबंधन में शामिल हुए थे। वीपी और राज बब्बर की सभाओं में भीड़ भी जुटती। इससे मुलायम सिंह सरकार के खिलाफ माहौल बना और वे सत्ता से बाहर हो गए। पर जनमोर्चा गठबंधन को इसका कोई फायदा नहीं मिला। फायदा हुआ मायावती की बीएसपी को, जिसका इस आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था।


कुछ लोग प्रियंका में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देखते है। वजह है कमोबेश वैसा ही चेहरा-मोहरा और वही आक्रामक स्वभाव।

इंदिरा की छवि

प्रियंका गांधी का आना फिर पुराने दिनों की याद दिलाता है। उनका यूपी के लोगों पर एक अलग असर रहा है। कुछ लोग प्रियंका में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देखते है। वजह है कमोबेश वैसा ही चेहरा-मोहरा और वही आक्रामक स्वभाव। इंदिरा-नेहरू परिवार का राज्य में गहरा असर रहा है। आज भी हर गांव में कोई न कोई पुराना कांग्रेसी जरूर मिल जाएगा। पर वोट की राजनीति में कांग्रेस का ढांचा बहुत कमजोर है। प्रियंका गांधी मध्यवर्ग को लुभाएंगी इसमें कोई शक नहीं, पर लोकसभा चुनाव में वे कितनी कामयाब होंगी, देखने की बात है।


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